बस स्टैंड भवन मरम्मत घोटाला,फाइलों में उलझी यात्रियों की सुरक्षा,नपा प्रशासन और प्रभारी कार्यपालन यंत्री के बीच 'शह-मात' का खेल

करोड़ों के मानस भवन जीर्णोद्धार पर 'मौन', तो जर्जर बस स्टैंड की सुध लेने में अड़ंगों की बौछार,जनता की जान दांव पर 


Junaid Khan - शहडोल। स्थानीय न्यू बस स्टैंड स्थित यात्री प्रतीक्षालय भवन के जर्जर होने और किसी बड़े हादसे की आशंका के बीच, नगर पालिका प्रशासन और जेडी ऑफिस (नगरीय प्रशासन विभाग) में पदस्थ प्रभारी कार्यपालन यंत्री अरविंद शर्मा के बीच की अंदरूनी तनातनी अब खुलकर सड़क पर आ गई है। जनहित और यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े इस बेहद संवेदनशील मामले में हो रही हीलाहवाली सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करती है। न्यू बस स्टैंड में तत्काल मरम्मत कार्य कराने के लिए नगर पालिका द्वारा गत 5 मई को ही प्रभारी कार्यपालन यंत्री को ऑनलाइन स्वीकृति हेतु प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन, प्रशासनिक सुस्ती का आलम यह रहा कि पूरे 15 दिनों तक इस अति-महत्वपूर्ण फाइल को ठंडे बस्ते में डाले रखा गया। जब 18 मई को नगर पालिका द्वारा लिखित में रिमाइंडर भेजा गया, तब कहीं जाकर नींद से जागे प्रभारी कार्यपालन यंत्री ने अगले ही दिन 19 मई को जवाब में नियमों का हवाला देते हुए आपत्तियों की पूरी झड़ी लगा दी। विभागीय खींचतान की इस 'शह-मात' में विकास कार्य तो ठप हैं ही, साथ ही रोज सफर करने वाले हजारों यात्रियों की जान भी सीधे तौर पर दांव पर लगी हुई है।

सीएमओ का तीखा वार,जानबूझकर काम में हो रहा विलंब, कोई हादसा हुआ तो जिम्मेदारी किसकी? 

शहडोल। इस पूरे मामले में प्रशासनिक अड़ंगेबाजी से नाराज नगर पालिका सीएमओ आशा भंडारी ने 22 मई को प्रभारी कार्यपालन यंत्री को एक बेहद कड़ा और चुनौती भरा पत्र लिखा है। सीएमओ ने सीधे शब्दों में आरोप लगाया है कि प्रभारी कार्यपालन यंत्री द्वारा जानबूझकर इस जनहित के कार्य में देरी की जा रही है। पत्र में यहां तक तंज कसा गया है कि यदि प्रस्तावित निर्माण स्थल प्रभारी कार्यपालन यंत्री के घर के नजदीक है, तो वे स्वयं जाकर वहां की बदहाली और जर्जर स्थिति का मुआयना कर सकते हैं। सीएमओ ने साफ किया कि न्यू बस स्टैंड में मरम्मत का काम बेहद जरूरी और अपरिहार्य है; यदि इस जानबूझकर किए जा रहे प्रशासनिक विलबं के कारण भविष्य में कोई भी अप्रिय घटना या बड़ी दुर्घटना होती है, तो इसकी पूरी और सीधी जिम्मेदारी संबंधित यंत्री की होगी। उधर, इन तीखे आरोपों के बीच प्रभारी कार्यपालन यंत्री अरविंद शर्मा अपनी तकनीकी आपत्तियों पर अड़े हुए हैं। उनका तर्क है कि मरम्मत कार्य शुरू करने से पहले भवन का 'स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेट' (Structural Certificate) अनिवार्य है, जो पीडब्ल्यूडी (PWD) या पीआईयू (PIU) जैसी अधिकृत एजेंसी से बनना चाहिए। यंत्री का दावा है कि बिना इस प्रमाण पत्र के काम शुरू करना स्थापित नियमों के खिलाफ होगा।

दोहरे मापदंडों का बेनकाब सच,मानस भवन के ₹1.75 करोड़ के टेंडर पर क्यों नहीं जागा 'नियम कायदों' का प्रेम?

संयुक्त संचालक नगरीय प्रशासन विभाग के अंतर्गत प्रभारी कार्यपालन यंत्री अरविंद शर्मा द्वारा बस स्टैंड को लेकर उठाई गई इन तकनीकी आपत्तियों ने अब एक नए और बड़े वित्तीय अंतर्विरोध को जन्म दे दिया है। स्थानीय हलकों और प्रबुद्ध नागरिकों के बीच सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठ रहा है कि आखिर नियमों की यह कड़ाई केवल चुनिंदा फाइलों पर ही क्यों लागू होती है? शहर के 'मानस भवन' की मरम्मत और जीर्णोद्धार के नाम पर लगभग 1 करोड़ 75 लाख रुपए के अलग-अलग टेंडर धड़ाधड़ मंजूर कर दिए गए। जनता अब सीधे तौर पर यह सवाल पूछ रही है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर हो रहे मानस भवन के जीर्णोद्धार कार्य के लिए कोई 'स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेट' लिया गया था? यदि हां, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? और अगर नहीं लिया गया, तो फिर प्रभारी कार्यपालन यंत्री का यह 'नियम-प्रेम' और तकनीकी आपत्ति केवल आम जनता और गरीब यात्रियों से जुड़े न्यू बस स्टैंड की फाइल पर ही आकर क्यों जागती है? इस दोहरे मापदंड और चहेतों को लाभ पहुंचाने वाली कार्यप्रणाली के पीछे की असली कड़ियों को बेनकाब करना अब बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि जनता के टैक्स के पैसों का ऐसा मनमाना उपयोग और सुरक्षा से समझौता किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

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