प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा,शहडोल जिला अस्पताल में 'इलाज' से पहले 'अग्निपरीक्षा

भीषण गर्मी में ओपीडी पर्ची के लिए घंटों कतार में खड़ा रहने को मजबूर मरीज, क्या यही है स्वास्थ्य सुविधाओं का दाबा?


Junaid Khan - शहडोल। भीषण गर्मी और आसमान से बरसती आग के बीच शहडोल का जिला अस्पताल इन दिनों मरीजों के लिए राहत की जगह आफत का केंद्र बन गया है। अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के कारण दूर-दराज से आए बीमार लोग और उनके परिजन चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर हैं। हाल ही में इस मुद्दे के उजागर होने के बाद स्थानीय स्तर पर हड़कंप तो मचा है, लेकिन धरातल पर व्यवस्थाएं आज भी जस की तस हैं, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान लगाती हैं।

धूप की तपिश और बुनियादी सुविधाओं का अभाव अस्पताल परिसर में ओपीडी काउंटर के बाहर की तस्वीर विचलित करने वाली है। सुबह से ही शुरू होने वाली मरीजों की भीड़ के लिए यहाँ न तो पर्याप्त शेड की व्यवस्था है और न ही बैठने का कोई उचित प्रबंध। पारा 40 डिग्री के पार जा रहा है, लेकिन अस्पताल प्रशासन को इन लाचार मरीजों की तकलीफ दिखाई नहीं दे रही। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए यह स्थिति और भी अधिक कष्टकारी हो गई है, जहाँ इलाज की उम्मीद में आए लोग धूप के कारण बेहोश होने की कगार पर पहुँच जाते हैं। पर्ची काउंटर से लेकर सोनोग्राफी तक अव्यवस्था का साम्राज्य। अस्पताल की अव्यवस्था केवल ओपीडी पर्ची काउंटर तक सीमित नहीं है। सोनोग्राफी और एक्स-रे कक्ष के बाहर भी मरीजों का हाल बेहाल है। अपनी बारी के इंतजार में घंटों लाइन में लगे मरीजों के लिए यहाँ न तो पंखों की व्यवस्था है और न ही पीने के ठंडे पानी का कोई सुचारु इंतजाम। मरीजों का कहना है कि वे बीमारी से लड़ें या इस प्रशासनिक कुप्रबंधन से? हर जगह केवल अव्यवस्थाओं का ही बोलबाला नजर आता है। गर्भवती महिलाओं की सेहत से खिलवाड़। अस्पताल की इस बदहाली का सबसे काला पक्ष यह है कि यहाँ जाँच के लिए आने वाली गर्भवती महिलाओं को भी घंटों उमस और गर्मी के बीच खड़ा रहना पड़ता है। चिकित्सा विज्ञान जहाँ गर्भवती महिलाओं को विशेष देखभाल और सुरक्षित वातावरण देने की वकालत करता है, वहीं जिला अस्पताल का यह नजारा स्वास्थ्य मानकों की धज्जियां उड़ा रहा है। घंटों खड़े रहने के कारण इन महिलाओं की स्थिति बिगड़ना स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद चिंताजनक है।

अस्पताल प्रबंधन की अनदेखी या जानबूझकर लापरवाही? जिला अस्पताल में हर साल करोड़ों का बजट बुनियादी सुविधाओं और सुधार के नाम पर आता है। इसके बावजूद, एक अदद शेड और बैठने की कुर्सियों की कमी यह दर्शाती है कि बजट का बंदरबांट कहीं और ही हो रहा है। प्रशासन की इस अनदेखी के चलते दूर-दराज के गांवों से आए गरीब मरीज, जो प्राइवेट अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते, यहाँ सरकारी सिस्टम की बलि चढ़ रहे हैं। जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठते सवाल। इतनी बड़ी समस्या के बावजूद अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी अपने वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलने की जहमत नहीं उठा रहे। जब मरीजों की जान जोखिम में हो, तब प्रबंधन की यह चुप्पी अपराधी की तरह लगती है। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? या फिर गरीब जनता की तकलीफें अब फाइलों और आंकड़ों के नीचे दबकर रह गई हैं? असरदार खबरों के बाद भी नहीं बदली तस्वीर। स्थानीय मीडिया द्वारा बार-बार इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद भी शासन-प्रशासन के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। हालांकि खबरें प्रकाशित होने पर कुछ समय के लिए दिखावटी हलचल जरूर होती है, लेकिन ठोस कार्रवाई के अभाव में स्थिति पुनः ढाक के तीन पात वाली हो जाती है। यह उन तमाम दावों की पोल खोलता है जिनमें स्वास्थ्य सुविधाओं को 'नंबर वन' बनाने की बात कही जाती है। सुधार नहीं तो आंदोलन की आहट। क्षेत्रीय जनता और जागरूक नागरिकों में अब इस अव्यवस्था को लेकर गहरा रोष व्याप्त है। यदि जल्द ही ओपीडी और जाँच केंद्रों के बाहर मरीजों के लिए उचित छाया, शीतल जल और बैठने की व्यवस्था नहीं की गई, तो जनता का यह आक्रोश उग्र रूप ले सकता है। अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद त्यागे और अस्पताल की इस 'बीमारी' का स्थाई इलाज करे। सम्पादकीय टिप्पणी: जिला अस्पताल की यह बदहाली केवल एक विभाग की विफलता नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक मशीनरी की संवेदनहीनता का जीवंत उदाहरण है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक गरीब मरीज इसी तरह धूप में जलने और सिस्टम की मार झेलने को मजबूर रहेंगे।

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