प्लेटलेट्स कम होने का झूठा बहाना बनाकर टाला प्रसव,निजी पैथोलॉजी की सेटिंग और 'कमीशनखोरी' के खेल ने ली मासूम की जान
Junaid Khan - शहडोल। शहडोल संभाग का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल अब गरीब मरीजों के लिए इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि 'डेथ जोन' साबित हो रहा है। यहाँ के डॉक्टरों और स्टाफ की संवेदनहीनता, घोर लापरवाही और निजी पैथोलॉजी सेंटरों से मलाईदार साठगांठ ने एक बार फिर एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को मातम में बदल दिया। जिला चिकित्सालय में प्रसव के लिए आई प्रसूता के नवजात शिशु की तड़प-तड़प कर हुई मौत के बाद पूरे जिले में आक्रोश की लहर है। इस गंभीर मामले को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद अब प्रशासनिक गलियारों और स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। अपनी नाकामी को छुपाने में जुटे अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ पीड़ित परिजनों ने सीधे जिले के मुखिया कलेक्टर, सिविल सर्जन और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को लिखित शिकायती पत्र सौंपकर दोषी डॉक्टरों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने और उनके लाइसेंस निरस्त करने की पुरजोर मांग की है।
निजी पैथोलॉजी को फायदा पहुँचाने का खेल,सामान्य रिपोर्ट के बाद भी समय पर नहीं किया ऑपरेशन
मामले की रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत यह है कि ग्राम झींक बिजुरी (जैतपुर) निवासी मो. इजहारुल मंसूरी ने अपनी प्रसूता पत्नी कनीज फात्मा को बीते 18 मई को प्रसव पीड़ा होने पर जिला अस्पताल में भर्ती कराया था। शुरुआत में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों ने स्थिति को सामान्य बताते हुए कहा कि प्रसव 'ऑपरेशन' (सिजेरियन) के जरिए करना पड़ेगा, जिसके लिए परिजन तुरंत तैयार हो गए। लेकिन इसके ठीक बाद सरकारी डॉक्टरों का असली अमानवीय चेहरा सामने आया। डॉक्टरों ने अचानक प्रसूता के 'प्लेटलेट्स कम' होने का झूठा हवाला देकर ऑपरेशन टाल दिया। हद तो तब हो गई जब डॉक्टरों ने अस्पताल की सरकारी लैब पर भरोसा न जताते हुए परिजनों को बाहर की एक निजी पैथोलॉजी से जांच कराने का दबाव बनाया। परिजनों ने जब आनन-फानन में बाहर से मोटी रकम देकर जांच कराई, तो वहां की रिपोर्ट पूरी तरह सामान्य आई और प्लेटलेट्स भी सही पाए गए। साफ है कि यह पूरी कवायद निजी पैथोलॉजी को फायदा पहुँचाने और कमीशनखोरी के लिए की गई थी।
रातभर तड़पती रही प्रसूता, सुबह जब नींद खुली तो पहुँच चुके थे यमराज
पीड़ित पिता मो. इजहारुल मंसूरी ने रोते हुए बताया कि बाहर की सामान्य रिपोर्ट लाकर डॉक्टरों के टेबल पर जमा करने के बावजूद, संवेदनहीन डॉक्टरों ने समय पर ऑपरेशन करने की जहमत नहीं उठाई। रात के वक्त जब प्रसूता कनीज फात्मा की हालत लगातार बिगड़ती चली गई और वह दर्द से तड़पती रही, तब भी ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर अपनी केबिन से बाहर नहीं निकले। बार-बार मिन्नतें करने के बाद भी डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ सोए रहे और मौके पर बेहद देर से पहुँचे। जब अगली सुबह डॉक्टरों की नींद खुली और आनन-फानन में प्रसूता का ऑपरेशन किया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों की इस लेट-लतीफी और आपराधिक लापरवाही के कारण कोख में ही नवजात शिशु की मौत हो चुकी थी। डॉक्टरों ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए मृत बच्चे को परिजनों को सौंपकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
कलेक्टर की चौखट पर न्याय की गुहार; क्या कमीशनखोर सफेदपोश डॉक्टरों पर चलेगा प्रशासन का चाबुक?
अस्पताल में हुई इस 'संस्थागत हत्या' के बाद पीड़ित परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों ने अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने जांच के निर्देश तो दे दिए हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह जांच महज़ एक कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी? जिला अस्पताल के डॉक्टरों की निजी क्लीनिकों और प्राइवेट पैथोलॉजी सेंटरों से सांठगांठ का यह कोई पहला मामला नहीं है। गरीब मरीजों की जान से खिलवाड़ कर अपनी जेबें भरने वाले इन तथाकथित 'भगवानों' को आखिर किसका संरक्षण प्राप्त है? सजग मीडिया और आम जनता अब कलेक्टर और सीएमएचओ की कार्रवाई पर नजरें गड़ाए बैठी है। अगर इन दोषी डॉक्टरों के खिलाफ तत्काल सख्त दंडात्मक कार्रवाई और निलंबन की कार्रवाई नहीं की गई, तो जिला अस्पताल के सामने उग्र जन-आंदोलन तय है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।
कमीशन के दलदल में धंसा जिला अस्पताल
जब जिला अस्पताल में सारी जांच सुविधाएं मुफ्त हैं, तो डॉक्टरों ने बाहर की निजी पैथोलॉजी से जांच कराने का दबाव क्यों बनाया? सरकारी लैब की विश्वसनीयता को कम बताकर निजी सेंटरों को फायदा पहुँचाने वाले इन डॉक्टरों पर सिविल सर्जन मौन क्यों हैं? रातभर प्रसूता के तड़पने के बावजूद समय पर ऑपरेशन न करना क्या सीधे-सीधे आपराधिक कृत्य' की श्रेणी में नहीं आता? क्या शहडोल का स्वास्थ्य महकमा इन लापरवाह डॉक्टरों पर एफआईआर दर्ज कराने का साहस दिखाएगा या मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
