क्या सरकार के 'बुलडोजर' को रेत माफिया ने ही खरीद लिया? गलहत्था और गाड़ाघाट से दिन-रात हो रहा नदी का सीना छलनी; पुलिस और खनिज विभाग की 'मौन स्वीकृति' ने क्षेत्र को बनाया अवैध उत्खनन का सबसे बड़ा सुराग, जिम्मेदार 'मलाई' काटने में व्यस्त!
Junaid Khan - शहडोल। जिले के जैतपुर थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते हुए अवैध रेत उत्खनन और परिवहन का जो 'महाखेल' खेला जा रहा है, उसने अब पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर तेजी से बहुप्रसारित (वायरल) हो रहे एक प्रामाणिक वीडियो ने इस पूरे काले कारोबार की कलई खोलकर रख दी है। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि रेत से आकंठ डूबे हाईवा के चालक और परिचालक बिना किसी खौफ के खुद कबूल कर रहे हैं कि यह रेत 'गलहत्था घाट' से अवैध रूप से लोड की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान में जिले के किसी भी रेत खदान का कोई वैध ठेका संचालित नहीं है, इसके बावजूद दिनदहाड़े और रातों-रात भारी-भरकम वाहन जैतपुर नगर के बीचों-बीच से सीना तानकर गुजर रहे हैं। पूर्व में इस सुलगते मुद्दे पर खबरें प्रकाशित होने के बाद भी जिम्मेदार महकमों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगना, सीधे तौर पर प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है।
पोकलेन और जेसीबी से खाली हो रहीं नदियां, एक आरक्षक के 'खास संरक्षण' में फल-फूल रहा करोड़ों का सिंडिकेट
स्थानीय ग्रामीणों के आक्रोश की ज्वाला अब फूटने लगी है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि गाड़ाघाट, गलहत्था समेत क्षेत्र के कई प्रमुख घाटों से चौबीसों घंटे रेत की खुली डकैती हो रही है। नदी के भीतर भारी-भरकम पोकलेन और जेसीबी मशीनें उतारकर जलस्रोत का अस्तित्व ही मिटाया जा रहा है। इस पूरे सिंडिकेट में जैतपुर थाने में पदस्थ एक 'खास आरक्षक' का नाम इन दिनों क्षेत्र के बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। चर्चाएं गर्म हैं कि इस आरक्षक पर पूर्व में भी माफिया से सांठगांठ के गंभीर आरोप लग चुके हैं, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों का वरदहस्त होने के कारण इस पर आंच तक नहीं आती। जब जनता का विरोध उग्र होता है या मीडिया में खबरें सुर्खियां बनती हैं, तो खनिज विभाग और स्थानीय पुलिस 'मजबूरी' का नाटक करते हुए इक्का-दुक्का वाहनों को पकड़कर अपनी पीठ थपथपा लेती है।
छग की खदानों की 'टीपी' का तगड़ा खेल, कागजी हेराफेरी से 'अवैध' को पल भर में 'वैध' बना रहा माफिया का नेटवर्क
इस पूरे काले धंधे की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि जैसे ही कोई वाहन पुलिस या खनिज विभाग की पकड़ में आता है, वैसे ही पर्दे के पीछे से 'मैनेजमेंट' का खेल शुरू हो जाता है। वाहन मालिक तत्काल छत्तीसगढ़ (छग) की खदानों से फर्जी या आनन-फानन में जारी करवाई गई टीपी (परिवहन अनुज्ञापform) पेश कर देते हैं। इस शातिर दांव से पूरा अवैध खेल वैध कागजों की आड़ में छिप जाता है। इस 'कागजी जादूगरी' ने साबित कर दिया है कि रेत माफिया का नेटवर्क कितना गहरा और अंतर्राज्यीय स्तर पर कितना मजबूत है। इस मिलीभगत की आशंका अब सौ फीसदी यकीन में बदल चुकी है कि बिना विभागीय शह के यह 'कागजी हेराफेरी' संभव ही नहीं है। नदी का अस्तित्व दांव पर, क्या शहडोल का प्रशासन 'जल समाधि' का इंतजार कर रहा है?
अवैध उत्खनन के इस बेलगाम तांडव से सोन और उसकी सहायक नदियों का प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह नष्ट हो चुका है, जलस्तर पाताल में जा रहा है और पर्यावरण को ऐसा जख्म दिया जा रहा है जिसकी भरपाई नामुमकिन है। पूर्व में इस गंभीर मुद्दे को उठाए जाने के बाद भी प्रशासन का यह "मौन" किसी बड़े घालमेल की गवाही दे रहा है। एक तरफ सूबे के मुख्यमंत्री जीरो टॉलरेंस और माफिया राज को नेस्तनाबूद करने का दम भरते हैं, तो दूसरी तरफ जैतपुर में रेत माफिया खुलेआम सरकार के इकबाल को चुनौती दे रहा है। अब देखना यह है कि इस प्रामाणिक वीडियो और जन-आक्रोश के सामने आने के बाद भी खनिज विभाग और जैतपुर पुलिस मौन की चादर ओढ़े रहती है, या फिर इस 'काली कमाई' के सिंडिकेट को जमींदोज करने का साहस दिखा पाती है।
जनता का तीखा सवाल:
आखिर किसके इशारे पर जैतपुर का वह विवादित आरक्षक लगातार वहीं जमा हुआ है? बिना वैध ठेके के, प्रतिदिन सैकड़ों हाईवा रेत जैतपुर मुख्य मार्ग से किसकी अनुमति से गुजर रही है? पकड़े जाने पर छत्तीसगढ़ की खदानों की टीपी अचानक कहां से प्रकट हो जाती है, इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होती?
