महा-कार्रवाई,ब्यौहारी में भ्रष्टाचार के अभेद्य 'सिंडिकेट' पर कलेक्टर का करारा प्रहार, राजनीतिक दबाव भी पड़ा फीका

लगातार उजागर हो रहे घोटालों पर चली प्रशासनिक चाबुक,एसडीएम और तहसीलदार लपेटे में, रिश्वतखोर बाबू की बर्खास्तगी तय,सफेदपोशों के संरक्षण की कोशिशें नाकाम


Junaid Khan - शहडोल। लगातार भ्रष्टाचार और अकूत रिश्वतखोरी की दलदल में धंस चुके ब्यौहारी तहसील मुख्यालय पर प्रशासनिक तंत्र ने अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा प्रहार किया है। क्षेत्र की जनता को लूटने और सरकारी दफ्तरों को दलाली का अड्डा बनाने वाले सिंडिकेट के खिलाफ यह कार्रवाई किसी बड़े धमाके से कम नहीं है। खबरों के माध्यम से लगातार उजागर हो रहे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ कलेक्टर ने 'जीरो टॉलरेंस' का वो सख्त रुख अख्तियार किया है, जिसने समूचे प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। सूत्रों की मानें तो ब्यौहारी एसडीएम भागीरथ लहरें और तहसीलदार राजकुमार कोल को तत्काल प्रभाव से हटाने के इस बड़े फैसले को रोकने के लिए एक बेहद प्रभावशाली जनप्रतिनिधि ने आखिरी वक्त तक एड़ी-चोटी का जोर लगाया और दागी अधिकारियों के बचाव में ढाल बनने की कोशिश की। लेकिन, सुशासन और जनता के प्रति जवाबदेही के संकल्प के आगे यह राजनीतिक दबाव पूरी तरह बौना साबित हुआ। कलेक्टर ने बिना किसी रसूख की परवाह किए इन दोनों बड़े अधिकारियों पर गाज गिरा दी है, जबकि रिश्वत कांड के मुख्य सूत्रधार बाबू को बर्खास्त करने की अंतिम तैयारी कर ली गई है। इस साहसिक कदम ने यह साफ कर दिया है कि जनता के हक पर डाका डालने वाले भ्रष्टाचारियों और उन्हें सह देने वाले सफेदपोशों के दिन अब लद चुके हैं।

लोकायुक्त का शिकंजा,75 हजार की घूस लेते रंगे हाथ धराया लेखापाल,तहसील बनी थी 'उगाही केंद्र' 

यह पूरी महा-कार्रवाई ब्यौहारी तहसील कार्यालय में फैले उस संगठित भ्रष्टाचार का नतीजा है, जो चंद रुपयों के लिए आम जनता का खून चूस रहा था। महज अप्रैल महीने में ही एसडीएम दफ्तर के एक बाबू को लोकायुक्त द्वारा ट्रैप किए जाने के बाद भी यहां का बेखौफ तंत्र सुधरने का नाम नहीं ले रहा था। ताजा मामले में, नगर परिषद खांड की उपाध्यक्ष सुधा रजक के पति रमेश प्रसाद रजक (निवासी बाणसागर) के सरकारी मकान से जुड़े एक प्रकरण को रफा-दफा करने और कब्जा हटाने के नाम पर सहायक खंड लेखापाल लल्लू प्रजापति ने खुलेआम सौदेबाजी की हदें पार कर दी थीं। आरोपी बाबू पूर्व में ही पीड़ित से 35 हजार रुपये की अग्रिम राशि डकार चुका था, और जैसे ही वह तहसील परिसर के भीतर शेष 75 हजार रुपये की मोटी रकम की घूस ले रहा था, पहले से जाल बिछाए बैठी लोकायुक्त की टीम ने उसे रंगे हाथ दबोच लिया। तहसील परिसर के भीतर सरेआम हुई इस ट्रैपिंग ने यह साबित कर दिया कि ब्यौहारी का यह दफ्तर आमजन की समस्याओं के निराकरण का केंद्र नहीं,बल्कि अवैध वसूली की मुस्तैद चौका बन चुका था। लगातार दूसरी बार लोकायुक्त के इस बड़े प्रहार के बाद कलेक्टर ने तात्कालिक फेरबदल करते हुए बुढ़ार तहसीलदार सुमित गुर्जर को ब्यौहारी की कमान सौंपी है, ताकि चरमराई व्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाया जा सके।

अवैध साम्राज्य और भ्रष्ट तंत्र को खुली चुनौती,अब खैर नहीं,रडार पर कई और बड़ी मछलियां 

कलेक्टर की इस अप्रत्याशित और ताबड़तोड़ कार्रवाई ने जिले के उन तमाम अधिकारियों और माफियाओं को खुली चुनौती दे दी है जो व्यवस्था की आड़ में अपने अवैध साम्राज्य को पाल रहे हैं। प्रशासनिक गलियारों में यह स्पष्ट संदेश तैर गया है कि चाहे पद कितना भी बड़ा हो या पीठ पर किसी राजनेता का हाथ, जनता की लापरवाही और वित्तीय अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि जिले के शासकीय कार्यालयों में फैले उस दीमक के खिलाफ सीधी जंग का ऐलान है जो पारदर्शी और निष्पक्ष प्रशासन की नींव को खोखला कर रहा था। विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि ब्यौहारी का यह एक्शन तो महज एक शुरुआत है, आने वाले दिनों में जिले के अन्य संवेदनशील विभागों और दफ्तरों पर भी कड़ी निगरानी और खुफिया जांच बैठने वाली है। जनता से जुड़े मामलों में दलाली खाने वाले कई और 'बड़े मगरमच्छ' और अवैध गतिविधियों को संरक्षण देने वाले चेहरे प्रशासनिक रडार पर आ चुके हैं, जिन पर जल्द ही बड़ी गाज गिरना तय माना जा रहा है।

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