शहडोल प्रशासन की दोहरी नीति,₹75 हज़ारी रिश्वत पर 'सिंघम' अवतार, ₹400 करोड़ के खड़हुली महाघोटाले पर 'धृतराष्ट्र' जैसी चुप्पी

लोकायुक्त के एक्शन से सहमा महकमा,ब्यौहारी में प्रशासनिक फेरबदल के पीछे का सच क्या? 


Junaid Khan - शहडोल। संभागीय मुख्यालय सहित पूरे जिले में इन दिनों प्रशासनिक कार्यवाहियों का दोहरा मापदंड और चश्मा जनचर्चा का मुख्य विषय बन चुका है। एक ओर लोकायुक्त की टीम ने जैसे ही ₹75 हजार की रिश्वतखोरी के मामले में जाल बिछाया, वैसे ही प्रशासनिक अमला हरकत में आ गया और आनन-फानन में एसडीएम भागीरथी लहरे, तहसीलदार राजकुमार कोल सहित कार्यालयीन कर्मचारियों तक पर गाज गिर गई। लोकायुक्त की इस बड़ी चोट के तुरंत बाद शहडोल कलेक्टर डॉ. केदार सिंह ने प्रशासनिक कार्य सुविधा का हवाला देते हुए जयसिंहनगर की अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सुश्री काजोल सिंह को अतिरिक्त रूप से ब्यौहारी एसडीएम का प्रभार सौंप दिया। लेकिन गलियारों में सुगबुगाहट तेज है कि क्या यह महज एक तात्कालिक प्रशासनिक मरहम है या फिर ब्यौहारी क्षेत्र में लंबे समय से सुलग रहे भूमि विवादों और भ्रष्टाचार के जिन्न को दबाने की एक सोची-समझी कोशिश? जनता पूछ रही है कि जो तत्परता ₹75 हजार के घूसकांड पर दिखाई गई, वही तत्परता और वही कड़ा रुख तंत्र के उन बड़े आकाओं पर क्यों नहीं दिखता, जो अरबों के खेल में शामिल हैं?

खड़हुली-ब्यौहारी भूमि घोटाले के मुख्य सूत्रधारों को किसका संरक्षण? शहडोल की जनता मांग रही हिसाब

ब्यौहारी का यह इलाका आज कोई पहली बार विवादों में नहीं आया है। खड़हुली-ब्यौहारी क्षेत्र में कथित तौर पर हुए लगभग ₹400 करोड़ के बहुचर्चित और ऐतिहासिक भूमि घोटाले की गूंज लंबे समय से सुर्खियों में है। यह महज़ कोई छोटा-मोटा वित्तीय हेरफेर नहीं, बल्कि सरकारी और आदिवासियों की जमीनों को रसूखदारों के नाम करने का एक संगठित सिंडिकेट है, जो अवैध रूप से पैर पसारे बैठा है। जानकारों और निष्पक्ष विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि यदि इस ₹400 करोड़ के महाघोटाले की निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्च स्तरीय गहन जांच करा दी जाए, तो कइयों के मुखौटे उतर जाएंगे और शहडोल से लेकर भोपाल तक बैठे कई सफेदपोश और रसूखदार प्रशासनिक चेहरों की संलिप्तता उजागर हो जाएगी। मगर अफसोस, रसूख की धमक और राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ के कारण इस 'महापाप' की फाइलें ठंडे बस्ते में धूल खा रही हैं। अवैध साम्राज्य चलाने वाले भू-माफिया बेखौफ घूम रहे हैं और साहब हैं कि मौन साधे बैठे हैं!

छोटे प्यादों पर वार, बड़े मगरमच्छों से प्यार,लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की सीधी चुनौती 

अखबारों में छपी खबरों और जन-आक्रोश का ही असर है कि आज प्रशासन के इस दोहरे रवैये की कलई खुलकर सामने आ चुकी है। यह खबर सीधे तौर पर उस समूचे तंत्र और अवैध साम्राज्य के आकाओं को खुली चुनौती है जो इस मुगालते में हैं कि उनकी फाइलें कभी नहीं खुलेंगी। आमजन के मन में यह तीखा और गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर छोटे मामलों में 'क्विक एक्शन' और करोड़ों-अरबों के महाघोटालों पर रहस्यमयी चुप्पी क्यों? क्या शहडोल का जिला प्रशासन केवल छोटे प्यादों को मोहरा बनाकर अपनी पीठ थपथपाना चाहता है, या फिर इस ₹400 करोड़ के कथित घोटाले की भी उतनी ही ईमानदारी और गंभीरता से जांच करने का साहस दिखाएगा जैसी फुर्ती लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद दिखाई गई है? लोकतंत्र की बुनियादी शर्त पारदर्शिता है, और शहडोल की सजग जनता अब खोखली कार्यवाहियों से संतुष्ट होने वाली नहीं है साहब,अब जवाब तो देना ही होगा।

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