घरौला मोहल्ला में फूटा आक्रोश,बरौनी होटल के पीछे हनुमान मंदिर पास,जयसवाल किराना,गोले परिवार, श्रीवास्तव,और अशोक पंडित,की गली में हाहाकार; रसूखदारों को 'कृपा' और आम जनता के हिस्से सिर्फ 'सूखे नल' और 'अधूरा नोज'
कड़कती गर्मी में सिस्टम ठप, बूंद-बूंद को तरस रहे गले
Junaid Khan - शहडोल। जिला मुख्यालय में पड़ रही भीषण और कड़कती गर्मी के बीच नगर पालिका प्रशासन की घोर प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता खुलकर सामने आ गई है। पूर्व में प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों और जन-आक्रोश का संज्ञान लेते हुए हालांकि जिला प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए कलेक्ट्रेट परिसर में जल संकट से निपटने के लिए बकायदा विशेष कर्मचारियों और अधिकारियों की नियुक्ति कर एक कंट्रोल रूम स्थापित किया है, लेकिन धरातल पर इसका असर शून्य साबित हो रहा है। नगर पालिका का जमीनी उद्देश्य, जो कि नगरवासियों को न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं जैसे नियमित पेयजल उपलब्ध कराना है, वह इस समय पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। पूर्व में समय पर पर्याप्त दबाव के साथ आने वाला सरकारी नल अब इस तपती गर्मी में पूरी तरह ठप हो चुका है। हालत यह है कि पानी की टंकियां तो बहुत दूर की बात है, लोग अपनी बाल्टियां तक नहीं भर पा रहे हैं। यहां तक कि नहाने और इस कड़कती धूप में कंठ गिला करने के लिए सुराही और मटके तक भरने के लिए पानी नसीब नहीं हो रहा है, जिससे जनता का धैर्य अब जवाब दे रहा है।
घरौला मोहल्ला में हाहाकार; पार्षदों के भरोसे छोड़ सो रहा प्रशासन
नगर पालिका की इस तानाशाही और अव्यवस्था का सबसे वीभत्स रूप जिले के घरौला मोहल्ला परिसर स्थित बरौनी होटल के पीछे, हनुमान मंदिर के पास, जयसवाल किराना स्टोर, गोले के घर, श्रीवास्तव के घर और अशोक पंडित के घर वाली पूरी लाइन में देखने को मिल रहा है। इस पूरी बेल्ट में कई दिनों से पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है। स्थानीय सजग नागरिकों द्वारा वार्ड पार्षदों को लगातार फोन के माध्यम से शिकायतें दर्ज कराई गईं, लंबी बातचीत की गई, जिसके बाद पार्षदों ने अपनी ओर से भरपूर और बेहतर प्रयास करते हुए अधिकारियों को जगाने की कोशिश की। जब अधिकारियों के कान पर जूं नहीं रेंगी, तो पार्षदों ने मानवीय आधार पर अपने स्तर से निजी टैंकर मंगवा कर जनता को प्यासा मरने से बचाया। परंतु सवाल यह उठता है कि क्या निर्वाचित पार्षदों का काम केवल पालिका की कमियों को अपने खर्च पर छुपाना है? कलेक्ट्रेट के नए शिकायत नंबरों पर दर्जनों बार फोन लगाने के बावजूद आश्वासन के सिवाय वार्ड वासियों के हाथ कुछ नहीं लगा।
पानी के वितरण में वीआईपी कल्चर,गरीबों और मध्यमवर्ग के साथ छलावा
एक तरफ जहां जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, वहीं नगर पालिका की इस बंदरबांट में भेदभाव का खेल भी चरम पर है। कई वार्डों में टैंकर तो पहुंच रहे हैं, लेकिन वहां भी पक्षपात हावी है। जो गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार घर का कनेक्शन नहीं ले पा रहे हैं, उनके हक का पानी केवल रसूखदारों, खाली प्लॉट वालों या पार्षदों के कथित 'खास' लोगों की सुख-सुविधाओं के लिए मोड़ा जा रहा है। गरीब, मध्यमवर्गीय और आम समाजसेवी को एक समान दृष्टि से देखने के बजाय पालिका प्रशासन केवल रसूख की भाषा समझ रहा है, जो कि सीधे तौर पर जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। बड़ी-बड़ी कागजी कार्रवाइयों, औचक निरीक्षणों और जांचों की नौटंकी अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन जब तक जनता प्यासी है, तब तक प्रशासन की हर कार्रवाई खोखली है।
फील्ड कर्मचारियों का हैरान करने वाला कबूलनामा,फूटा सिस्टम का भांडा
दैनिक प्रदेश सत्ता,' की खोजी टीम ने जब इस पूरे मामले की पड़ताल के लिए धरातल पर पानी चालू करने वाले नगर पालिका के फील्ड कर्मचारियों से सीधा तीखा सवाल किया, तो उनका दर्द और सिस्टम की पोल दोनों एक साथ बाहर आ गए। कर्मचारियों ने साफ तौर पर स्वीकार किया कि मुख्य आपूर्ति केंद्र (सर्फा) से ही पानी बेहद लेट भेजा जाता है, और कई बार तो पानी आता ही नहीं है। मुख्य टंकियां खाली रहने के कारण उनके ऊपर एक साथ 12 से 15 वाटर लाइनों की सप्लाय बहाल करने का भारी बोझ रहता है। कर्मचारियों ने बेबसी जताते हुए कहा, "जब सर्फा से पानी ही नहीं आएगा और मशीनें गर्म होने पर बंद कर दी जाएंगी, तो हम क्या करें? हमें मजबूरी में वाल्व (नोज) को आधा ही खोलना पड़ता है ताकि किसी तरह थोड़ा-बहुत पानी सब जगह पहुंच सके। हमारे पास समय इतना कम होता है कि हम एक लाइन में मात्र 10 से 20 मिनट ही पानी चला पाते हैं। कर्मचारियों ने सीधे तौर पर जनता से कहा कि वे छोटे कर्मचारियों को कोसने के बजाय बड़े अधिकारियों और 'सर्फा' के प्रभारियों से बात करें। 'दैनिक प्रदेश सत्ता' जिला प्रशासन और मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) को सीधे चुनौती देता है कि यदि घरौला मोहल्ला सहित पूरे शहर की जलापूर्ति को तुरंत सुचारू, समयबद्ध और समान रूप से बहाल नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह जन-आक्रोश उग्र आंदोलन का रूप लेगा।
