सरकारी साख को बंधक बनाकर साहब के बंगले पर मुफ्त की पुताई,हफ़्तों बाद भी मौन बैठा प्रशासन

अब आर-पार की जंग में सपरिवार आमरण अनशन पर ठेकेदार 

सफेदपोश सिंडिकेट और आरटीओ दफ्तर के 'मुफ्तखोर' खेल का बड़ा खुलासा, ₹18.35 लाख के भुगतान के नाम पर मिला धोखा, पीड़ित ने दी आत्मदाह और अनशन की चेतावनी, आखिर कब टूटेगी शहडोल कमिश्नर और कलेक्टर की चुप्पी?


Junaid Khan - शहडोल। संभाग में प्रशासनिक तानाशाही, पद के दुरुपयोग और आर्थिक शोषण का एक ऐसा शर्मनाक सिंडिकेट सक्रिय है, जिसने पूरे सरकारी तंत्र की पारदर्शिता को मूकदर्शक बना दिया है। पूर्व में इस गंभीर वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किए जाने के बावजूद, कुंभकर्णी नींद सोए शहडोल प्रशासन ने मामले को ठंडे बस्ते में डालना ही मुनासिब समझा। खबर के प्रकाशन के बाद भी भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न होना यह साबित करता है कि जिले में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की बातें सिर्फ कागजी ढोंग हैं। एक तरफ रसूखदारों के इशारे पर नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, तो दूसरी तरफ अपने पसीने की गाढ़ी कमाई मांग रहे एक छोटे स्थानीय ठेकेदार को पाई-पाई के लिए दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर किया जा रहा है। प्रशासनिक अहंकार का आलम यह है कि महीनों बीत जाने के बाद भी इस खुली लूट पर जांच की एक आंच तक नहीं उठी।

क्या था पूरा मामला? सरकारी दफ्तर चमका,निजी बंगले पर 'मुफ्त' का मलाईदार खेल 

पूरा मामला बेहद सोचे-समझे और नियोजित तरीके से अंजाम दिए गए एक सिंडिकेट का है। वार्ड नंबर 10 निवासी स्थानीय ठेकेदार शिवम गुप्ता ने पूरी निष्ठा के साथ 23 दिसंबर से 10 फरवरी 2026 तक दिन-रात एक करके आरटीओ (RTO) कार्यालय शहडोल में पुट्टी और इमल्शन पेंट का कार्य मुकम्मल किया था। लेकिन हैरान करने वाला और सबसे स्याह पहलू तब सामने आया, जब विभागीय अधिकारियों ने अपने पद का घोर दुरुपयोग करते हुए एक रसूखदार बिचौलिए अरविंद सिंह के माध्यम से ठेकेदार पर दबाव बनाया। आरोप है कि इसी माध्यम का इस्तेमाल कर मैडम (आरटीओ) के निजी आवास (बंगले) पर भी लाखों रुपए की पुताई का काम पूरी तरह 'मुफ्त' में करा लिया गया। सरकारी बजट की आड़ में अपने निजी आशियाने को चमकाने का यह खेल सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। जब इस पसीने की कीमत यानी जीएसटी सहित कुल ₹18,35,819 का वैध बिल भुगतान के लिए पेश किया गया, तो अधिकारियों के तेवर बदल गए और अब फोन तक उठाना बंद कर दिया गया है।

अधिकारी का अजीबोगरीब और गैर-जिम्मेदाराना दावा, बिचौलियों का बढ़ा हौसला

जब इस महाघोटाले और आर्थिक शोषण पर आरटीओ प्रशासन से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने आरोपों को सिरे से नकारते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया। उनका अजीबोगरीब दावा था कि "कुछ लोगों ने मदद से काम किया था, वे शिकायतकर्ता को नहीं जानतीं।" एक जिम्मेदार श्रेणी के अधिकारी का यह बयान न केवल वित्तीय नियमों का सरेआम मखौल उड़ाता है, बल्कि कई तीखे कानूनी सवाल भी खड़े करता है। सवाल यह उठता है कि क्या कोई सरकारी कार्यालय किसी की 'निजी मदद' से पेंट कराया जा सकता है? इसके लिए कोई टेंडर या वित्तीय स्वीकृति क्यों नहीं थी? और यदि किसी ने 'मदद' की थी, तो उस स्वघोषित मददगार का नाम उजागर करने से विभाग क्यों भाग रहा है? यह गोलमोल जवाब साफ तौर पर सच को दबाने और अपनी जवाबदेही से भागने की एक नाकाम कोशिश है, जिसने बिचौलियों के हौसलों को और सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।

प्रशासन और भ्रष्ट अधिकारियों को खुली चुनौती, अब न्याय की आस में कड़ा अल्टीमेटम 

सरकारी चौखट पर न्याय की गुहार लगाकर थक चुके पीड़ित ठेकेदार शिवम गुप्ता ने अब इस प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। कलेक्टर को सौंपे गए अपने शिकायती पत्र में उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्ट तंत्र ने उन्हें भुखमरी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिसके चलते अब उनके पास आत्मदाह या अनशन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। ठेकेदार ने प्रशासन को 07 दिन का कड़ा अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनके वैध ₹18 लाख से अधिक के बिल का भुगतान सुनिश्चित नहीं कराया गया, तो वे अपने पूरे परिवार (जिसमें महिलाएं और मासूम बच्चे भी शामिल हैं) के साथ सीधे आरटीओ दफ्तर के सामने आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे। यह सीधे तौर पर शहडोल के जिला प्रशासन को खुली चुनौती है कि वह एक परिवार को मौत के मुंह में धकेलने वाले इन सफेदपोश भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देना बंद करे।

संपादकीय तीखा तीर - रीढ़विहीन तंत्र से जनता का सीधा सवाल

यह मामला केवल एक ठेकेदार के भुगतान का नहीं, बल्कि शहडोल संभाग के समूचे प्रशासनिक तंत्र के चेहरे पर लगा एक करारा तमाचा है। एक छोटे व्यवसायी की ₹18 लाख की रकम दबाकर बैठ जाना और फिर मुकर जाना, सीधे तौर पर 'प्रशासनिक डकैती' नहीं तो और क्या है? शासन के उच्च पदों पर बैठे नुमाइंदों की चुप्पी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या इस मलाईदार खेल के तार ऊपर तक जुड़े हैं? हमारे समाचार पत्र का यह साफ स्टैंड है कि जब तक इस गंभीर आर्थिक अनियमितता की निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारी और बिचौलियों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक हम जनता की आवाज बनकर सिस्टम को झकझोरते रहेंगे। अब देखना यह है कि शहडोल कलेक्टर इस खुली चुनौती को स्वीकार कर दंडात्मक कार्रवाई करते हैं, या फिर एक बार फिर भ्रष्टाचार की इस फाइल को रसूख के रद्दीखाने में डाल दिया जाएगा।

तीखे सवाल जिनका जवाब विभाग के पास नहीं 

1.बिना किसी सरकारी टेंडर या वित्तीय बजट के आरटीओ कार्यालय में लाखों का काम कैसे और किसके आदेश पर कराया गया?

2.अधिकारी के निजी बंगले पर मुफ्त की पुताई कराने का अधिकार किस सरकारी नियम पुस्तिका में लिखा है?

3.शिकायत के हफ़्तों बाद भी शहडोल संभाग के आला अधिकारियों ने इस मामले में जांच कमेटी क्यों नहीं गठित की?

23 दिसंबर से 10 फरवरी तक खून-पसीना एक किया, अब बच्चों के निवाले के लाले पड़े हैं। अगर 07 दिन में भुगतान नहीं हुआ, तो आरटीओ दफ्तर के सामने सपरिवार जान दे दूंगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।

शिवम गुप्ता, पीड़ित ठेकेदार

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