मैनेजमेंट' के दम पर दौड़ रहीं बिना नंबर की यमदूत गाड़ियां
अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा करोड़ों का सिंडिकेट; सुहागपुर, जैतपुर, बुढार थाना और यातायात पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
Junaid Khan - शहडोल। जिले में भले ही कागजों पर रेत का कोई आधिकारिक ठेका न हुआ हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि शहडोल संभाग के चारों ओर बहने वाली जीवनदायिनी नदियां और सदियों पुराने ग्रामीण तालाब इस समय रेत माफियाओं के क्रूर शिकंजे में हैं। माफियाओं की भूख इस कदर बढ़ चुकी है कि वे अब नदियों के साथ-साथ तालाबों के अस्तित्व को भी रात-दिन मिटाने में तुले हुए हैं। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, जिले के नरवार और बिजोरी क्षेत्र इस समय अवैध रेत उत्खनन और परिवहन के सबसे बड़े और सुरक्षित गढ़ बन चुके हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि संभाग मुख्यालय पर कमिश्नर, आईजी, एडीजी, डीआईजी, कलेक्टर और एसपी जैसे आला अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद, उनकी नाक के नीचे यह समानांतर अवैध कारोबार धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। क्या इन शीर्ष अधिकारियों को इस महालूट की भनक नहीं है, या फिर 'मौन स्वीकृति' ही इस सिंडिकेट की असली ताकत है? यह आज एक बड़ा यक्ष प्रश्न बन चुका है।
थाना क्षेत्रों का अटूट मैनेजमेंट, चेकिंग के नाम पर सिर्फ औपचारिकता, बिना नंबर के दौड़ रहे वाहन
विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल को निर्बाध गति से चलाने के लिए स्थानीय पुलिस और यातायात अमले के साथ एक बेहद मजबूत 'मंथली मैनेजमेंट' का ताना-बाना बुना गया है। सुहागपुर पुलिस, जैतपुर थाना पुलिस, बुढार पुलिस और यातायात पुलिस की आंखों पर खाकी की जगह 'सुविधा शुल्क' की पट्टी बंधी हुई है। दिन-दहाड़े और काली रातों में बिना नंबर प्लेट के ट्रैक्टर-ट्रॉली, ट्रक और डग्गिया जैसे वाहन सड़कों पर खुलेआम फर्राटे भर रहे हैं। पुलिस की तथाकथित चेकिंग चौकियां सिर्फ एक दिखावा साबित हो रही हैं, जहां इन अवैध वाहनों को रोकने के बजाय बाकायदा 'ग्रीन सिग्नल' देकर रवाना किया जाता है। बिना नंबर के इन वाहनों का सड़कों पर दौड़ना साफ तौर पर यह साबित करता है कि जिले की कानून व्यवस्था पूरी तरह से माफियाओं के सामने नतमस्तक हो चुकी है।
यादव ब्रदर्स की टीम और गुल्लू,आकिब गैंग की समानांतर हुकूमत, इन नामों पर उठ रही उंगली
अवैध रेत के इस काले साम्राज्य में कुछ रसूखदार नाम सीधे तौर पर सामने आ रहे हैं। सूत्रों के हवाले से खबर है कि इस पूरे रूट पर 'यादव ब्रदर्स' नामक ट्रैक्टर चालकों ने अपनी एक बकायदा संगठित टीम तैयार कर रखी है, जो बिना किसी खौफ के नदियों का सीना चीर रही है। इसके समानांतर गुल्लू, आकिब, अज्जू, गोरे और डग्गिया वाले मिलकर डग्गी और ट्रैक्टरों का एक बड़ा बेड़ा चला रहे हैं। वहीं चुम्मन, आशीष, श्रीपत और छेकलाल जैसे नाम भी इस अवैध चेन की मजबूत कड़ियां हैं, जिनकी गाड़ियां दिन-रात रेत की ओवरलोडिंग कर सड़कों को जमींदोज कर रही हैं। इन गुर्गों और उनके आकाओं का दुस्साहस इतना बढ़ चुका है कि इन्हें न तो खनिज विभाग का डर है और न ही स्थानीय पुलिस का।
नशे में धुत यमदूत बने ड्राइवर,ओवरलोडिंग से आम जनता की जिंदगी दांव पर
इस अवैध कारोबार का सबसे खौफनाक पहलू यह है कि इन बिना नंबर के वाहनों को चलाने वाले अधिकांश ड्राइवर भारी नशे की हालत में रहते हैं। अंधाधुंध रफ्तार, क्षमता से दोगुना ओवरलोड रेत और ऊपर से नशे में चूर ड्राइवर—ये तीन संयोजन मिलकर शहडोल की सड़कों पर चलते-फिरते यमदूत बन चुके हैं। आए दिन होने वाले हादसों और सड़क सुरक्षा को ताक पर रखकर ये वाहन मुख्य मार्गों से गुजरते हैं, जिससे राहगीरों और ग्रामीणों की जान हमेशा हलक में अटकी रहती है। यातायात पुलिस इन ओवरलोड और नशेड़ी ड्राइवरों पर कार्रवाई करने के बजाय केवल मूकदर्शक बनी बैठी है, जो किसी बड़े हादसे को खुली दावत दे रहा है।
सफेदपोशों की 'खादी' भी दागदार, जनता की जेब पर डाका और प्राकृतिक संपदा की खुली लूट
यह केवल चंद प्रशासनिक नुमाइंदों और माफियाओं की साठगांठ नहीं है, बल्कि इस खेल के पीछे क्षेत्र के कई कद्दावर नेताओं और सफेदपोशों के हाथ होने की बात भी खुलकर सामने आ रही है। खाकी और खादी के इसी कॉकटेल के कारण आए दिन लाखों-करोड़ों रुपए की रेत बिना किसी रॉयल्टी और सरकारी राजस्व के ठिकाने लगाई जा रही है। सरकारी खजाने को चूना लगाने के साथ-साथ ये माफिया आम जनता को भी दोनों हाथों से लूट रहे हैं। कृत्रिम किल्लत पैदा कर रेत के दाम आसमान पर पहुंचा दिए गए हैं, जिससे अपना आशियाना बनाने वाले आम नागरिकों की जेब पूरी तरह कट रही है। जनता बेबस है और 'सिंडिकेट' हर रोज अपनी तिजोरियां भर रहा है।
प्रशासन को खुली चुनौती,कब थमेगा यह तांडव, या शीर्ष पदों पर बैठे अफसर भी हैं इस पाप के हिस्सेदार?
जब जिले की पूरी पुलिसिंग और प्रशासनिक अमला ही इस अवैध कारोबार को संरक्षण देने के घेरे में आ जाए, तो जनता न्याय की गुहार किससे लगाए? शहडोल में बैठे शीर्ष हुक्मरानों—कमिश्नर, कलेक्टर और एसपी को अब अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। खुलेआम चल रहे इस रेत के तांडव पर उनकी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या वे इस महालूट से वाकई अनजान हैं, या फिर इस बहती गंगा में ऊपर से नीचे तक हाथ धोए जा रहे हैं? यह खबर सीधे तौर पर जिला प्रशासन और संभाग के आला अधिकारियों को एक खुली चुनौती है कि वे अपनी साख बचाएं और इस संगठित माफिया राज पर बुलडोजर चलाएं, वरना जनता का इस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा उठना तय है।
