बजट डकार गए मैदानी अफसर,नौनिहालों के हिस्से आया सिर्फ 'कुपोषण'

शहडोल के NRC केंद्रों पर क्षमता से अधिक मासूम भर्ती,दावों की खुली पोल,महिला बाल विकास और स्वास्थ्य महकमे की कागजी जादूगरी ने नौनिहालों को धकेला मौत के कुएं में


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में कुपोषण को जड़ से मिटाने के सरकारी ढोल की पोल धरातल पर पूरी तरह से खुल चुकी है। जिला प्रशासन, महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य महकमे की एसी कमरों में बैठकर बनाई जाने वाली कागजी योजनाओं को जमीनी हकीकत ने करारा तमाचा मारा है। जिले के पोषण पुनर्वास केंद्रों (एनआरसी) से जो खौफनाक और रूह कंपा देने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे सीधे तौर पर शासन-प्रशासन की लचर व्यवस्था और मैदानी स्तर पर व्याप्त घोर भ्रष्टाचार व लापरवाही को उजागर करती हैं। जिले में एनआरसी केंद्रों में स्वीकृत बिस्तरों की कुल क्षमता महज 70 है, लेकिन इसके मुकाबले 77 गंभीर रूप से कुपोषित मासूम बच्चे जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। क्षमता से अधिक बच्चों का भर्ती होना यह साबित करने के लिए काफी है कि जमीनी स्तर पर कुपोषण का दानव आज भी मासूमों के बचपन को निगलने पर आमादा है और जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ 'सब चंगा सी' की रिपोर्ट चमकाने में मशगूल हैं।

ब्यौहारी और जिला मुख्यालय में पैर रखने की जगह नहीं, अतिरिक्त व्यवस्थाओं के भरोसे सांसें। ताजा और चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, जिले के 06 एनआरसी केंद्रों पर कुपोषण का भारी दबाव है। जिला मुख्यालय सहित ब्यौहारी, बुढ़ार और गोहपारू के केंद्रों में अब पैर रखने तक की जगह नहीं बची है। आलम यह है कि स्वीकृत क्षमता से सात बच्चे अधिक भर्ती हैं, जिन्हें मजबूरन अतिरिक्त और कामचलाऊ व्यवस्थाओं के सहारे बेड पर रखा गया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो जिला चिकित्सालय शहडोल की एनआरसी में 20 में से 18 बच्चे जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं, जबकि ब्यौहारी जैसे बड़े केंद्रों पर तो हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि वहां तत्काल बिस्तरों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि, जयसिंहनगर और सिंहपुर में कुछ बेड खाली होना ही इस बदहाल व्यवस्था में एकमात्र मामूली राहत की बात है। स्वास्थ्य विभाग भले ही बच्चों को संतुलित पोषण आहार और नियमित जांच का तर्क देकर अपनी पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में बच्चे गंभीर कुपोषण की कगार पर पहुंचे कैसे? क्या आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बांटे जाने वाले पौष्टिक आहार को मैदानी अमला और ठेकेदार मिलकर डकार गए? कागजों पर चमक रही रिपोर्ट, कुंभकर्णी नींद में सोया मैदानी अमला। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ मानना है कि कुपोषण के इस कलंक को सिर्फ अस्पतालों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर या समीक्षा बैठकें करके नहीं धोया जा सकता। इसके लिए ग्रामीण अंचलों में आंगनवाड़ी केंद्रों की सुस्त और भ्रष्ट कार्यप्रणाली को दुरुस्त करना होगा। जब तक गर्भवती और धात्री माताओं को समय पर पौष्टिक आहार नहीं मिलेगा और मैदानी अमला सिर्फ कागजों पर रिपोर्ट चमकाकर करोड़ों रुपये के बजट का बंदरबांट करता रहेगा, तब तक नौनिहालों का भविष्य ऐसे ही अंधकार में झूलता रहेगा। एनआरसी केंद्रों की यह डरावनी तस्वीर साफ संकेत दे रही है कि जिले में कुपोषण की चुनौती कम होने के बजाय और विकराल होती जा रही है। अब देखना यह है कि इस गंभीर और तीखी चेतावनी के बाद भी जिले के आला अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या मासूमों की सेहत और सरकारी खजाने के साथ यह खूनी खिलवाड़ यूं ही जारी रहता है।

Previous Post Next Post