दो अलग-अलग सनसनीखेज मामलों ने खोली व्यवस्था की पोल,रसूखदारों के आगे बौना साबित हो रहा भू-राजस्व महकमा,जांच की फाइलों पर धूल जमा रहे जिम्मेदार
Junaid Khan - शहडोल। संभाग क्षेत्र में भू-माफियाओं और रसूखदारों के हौसले इस कदर बुलंद हो चुके हैं कि अब वे सीधे शासकीय दस्तावेजों, कूटकरण (फोर्जरी) और कूट रचित साक्ष्यों के दम पर जमीनी लूट को अंजाम दे रहे हैं। हाल ही में सामने आए दो अलग-अलग मगर बेहद गंभीर शिकायत पत्रों ने राजस्व विभाग से लेकर स्थानीय प्रशासन के भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही की कलई खोलकर रख दी है। इन मामलों में साफ तौर पर उजागर हुआ है कि किस तरह नियम-कायदों को ताक पर रखकर, असली भूस्वामियों के अधिकारों को कुचलने और फर्जी दस्तावेजों को असली के रूप में पेश करने का सुनियोजित खेल खेला जा रहा है। सबसे हैरान करने वाली और प्रशासनिक तंत्र को सीधी चुनौती देने वाली बात यह है कि पीड़ित पक्षों द्वारा साक्ष्यों के साथ बार-बार लिखित शिकायतें सौंपने के बावजूद, जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। यह घोर निष्क्रियता न केवल भ्रष्टाचार को मूक संरक्षण देती है, बल्कि आम जनता के उस भरोसे को भी तार-तार करती है जो वह न्याय के लिए प्रशासन पर करती है। जांच की फाइलों को ठंडे बस्ते में डालना और माफियाओं को खुला संरक्षण देना यह साफ दर्शाता है कि नीचे से ऊपर तक सांठगांठ की जड़ें कितनी गहरी हैं। कलेक्टर से लेकर पुलिस कप्तान तक पहुंची शिकायत, फिर भी कार्रवाई सिफ़र; क्या रसूख के आगे नतमस्तक हैं जिम्मेदार अधिकारी? इन दोनों ही मामलों की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पीड़ितों ने न्याय की गुहार लगाते हुए सीधे जिले के मुखिया (कलेक्टर), पुलिस अधीक्षक (SP) और संबंधित अनुविभागीय अधिकारियों तक को साक्ष्यों सहित शिकायती पत्र सौंपे हैं। आवेदनों में स्पष्ट रूप से जालसाजी, धोखाधड़ी, शासकीय अभिलेखों में हेरफेर और बिना किसी सक्षम वैधानिक प्रक्रिया के जमीनों पर कब्जा करने या हथियाने का षड्यंत्र रचने वाले आरोपियों के नाम-पते सहित पूरी कुंडली दी गई है। इसके बावजूद, प्रशासनिक अमले द्वारा अब तक किसी भी ठोस कानूनी दंडात्मक कार्रवाई या प्राथमिकी (FIR) दर्ज न किया जाना पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे या जन-आक्रोश का इंतजार कर रहा है? या फिर इन जालसाजों के रसूख और राजनैतिक रसूख के आगे पूरा अमला नतमस्तक हो चुका है? यदि इन दोनों मामलों में तत्काल उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो यह लापरवाही आने वाले समय में एक बड़े जन-आंदोलन और प्रशासनिक विद्रोह का रूप ले सकती है, जिसकी पूरी जवाबदेही वर्तमान सुस्त व्यवस्था की होगी।
