नियमों को 'जाम' पिलाकर मंदिर और अस्पताल के बीच सजा दी शराब की दुकान, अब जनता का फूटेगा गुस्सा
Junaid Khan - शहडोल। प्रशासनिक संरक्षण और आबकारी विभाग की साठगांठ ने शहर के सबसे संवेदनशील और आस्था से जुड़े क्षेत्र को 'मधुशाला' में तब्दील कर दिया है। जेल तिराहे पर खुली शराब दुकान न केवल नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि यह उन अफसरों की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा तमाचा है जो कागजों पर 'आदर्श आबकारी नीति' का दम भरते हैं। स्थानीय रहवासियों ने अब सीधे तौर पर प्रशासन को चुनौती दे दी है या तो यह आवंटन निरस्त होगा, या फिर सड़कों पर 'जन-आंदोलन' का शंखनाद होगा।
अस्पताल और मंदिर की 'मर्यादा' दांव पर
हैरानी की बात यह है कि जहाँ शराब की दुकान खोली गई है, वहां से चंद कदमों की दूरी पर मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल है। यहाँ जिले के ख्यातिलब्ध शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र सिंह और डॉ. मनीष सिंह बैठते हैं, जहाँ दिन-भर माताओं और मासूम बच्चों का आना-जाना लगा रहता है। इसके ठीक बगल में जागेश्वर महादेव मंदिर है, जहाँ भक्तों की अपार श्रद्धा जुड़ी है। प्रशासन ने शायद यह मान लिया है कि शराब की गंध के बीच बच्चों का इलाज और महादेव की भक्ति साथ-साथ चलेगी।
100 मीटर का नियम गया तेल लेने,30 मीटर पर पैमाना
आबकारी नीति स्पष्ट कहती है कि शिक्षण संस्थान और धार्मिक स्थलों से 100 मीटर की परिधि में शराब दुकान नहीं हो सकती। लेकिन यहाँ तो कानून अंधा हो चुका है। जागेश्वर महादेव मंदिर महज 30 मीटर, नर्सिंग कॉलेज 42 मीटर और बाल संप्रेषण गृह 45 मीटर की दूरी पर है। इतना ही नहीं, जिला जेल भी यहाँ से केवल 110 मीटर पर स्थित है। सुरक्षा और शुचिता के तमाम पैमानों को ताक पर रखकर आखिर किसके दबाव में इस स्थान को चुना गया, यह जाँच का विषय है।
रात के अंधेरे में अवैध' ऑपरेशन
खबर की भयावहता इसी से समझी जा सकती है कि दुकान खोलने के लिए किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। 6 मई की अलसुबह, जब पूरा शहर सो रहा था, सुबह 5 बजे पुलिस और आबकारी विभाग की मौजूदगी में शराब से लदी गाड़ियां पहुँचती हैं और आनन-फानन में दुकान संचालित कर दी जाती है। न कोई विज्ञापन निकाला गया, न स्थानीय जनप्रतिनिधियों से राय ली गई और न ही रहवासियों की सहमति की परवाह की गई। यह पूरी कार्रवाई किसी चोर-दरवाजे से किए गए 'ऑपरेशन' जैसी प्रतीत होती है।
असामाजिक तत्वों का जमावड़ा और 'सनातन' पर चोट
दुकान खुलते ही यहाँ शराबियों का मेला लगना शुरू हो गया है। आसपास अवैध रूप से अंडा और मांस के ठेले सजने लगे हैं, जिससे मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय परिवारों का निकलना दूभर हो गया है। सनातन धर्म की मर्यादाओं को तार-तार करते हुए प्रशासन ने आस्था के केंद्र को अराजकता का अड्डा बना दिया है। लोगों का कहना है कि यहाँ शांति व्यवस्था कभी भी भंग हो सकती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।
कमिश्नर की दहलीज पर जन-आक्रोश
इस 'अवैध' कृत्य के खिलाफ क्षेत्रीय रहवासियों ने लामबंद होकर कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि प्रशासन खुद मौके का मुआयना करे और देखे कि कैसे नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पूर्व में दी गई चेतावनियों को अनसुना करने का नतीजा अब जन-आक्रोश के रूप में सामने आ रहा है। रहवासियों ने साफ कह दिया है कि उन्हें अब कोरे आश्वासन नहीं, बल्कि शराब दुकान की तालाबंदी का आदेश चाहिए।
प्रशासन की चुप्पी पर उठते बड़े सवाल
आखिर वो कौन सा 'ऊपर का हाथ' है जिसके आगे आबकारी विभाग के नियम बोने साबित हो रहे हैं? क्या जिला प्रशासन किसी बड़े हादसे या हिंसक विरोध का इंतज़ार कर रहा है? अस्पताल में इलाज कराने आने वाली महिलाएं और मंदिर जाने वाली बहन-बेटियां खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। यदि जल्द ही इस आवंटन को निरस्त नहीं किया गया, तो शहडोल की सड़कों पर ऐसा आंदोलन होगा जिसे संभालना शासन-प्रशासन के वश में नहीं होगा। मुख्य बिंदु दूरी का सच: मंदिर 30 मीटर, नर्सिंग कॉलेज 42 मीटर, जेल 110 मीटर नियमों की धज्जियां उड़ीं। अंधेरे का खेल: 6 मई सुबह 5 बजे पुलिस की मौजूदगी में बिना किसी सूचना के खुली दुकान। सीधी चुनौती: आवंटन निरस्त नहीं हुआ तो उग्र आंदोलन की दी चेतावनी।
