जेल की चारदीवारी में थमी सांसे,इलाज में देरी या लापरवाही? कैदी की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल

जेल की चारदीवारी में थमी सांसे,इलाज में देरी या लापरवाही? कैदी की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल


Junaid Khan - शहडोल। जिला जेल की सुरक्षा और वहां मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों की कलई एक बार फिर खुल गई है। जेल में सजा काट रहे एक 30 वर्षीय युवा कैदी की हृदयघात (हार्ट अटैक) से हुई मौत ने जेल प्रशासन से लेकर जिला अस्पताल के आपातकालीन प्रबंधन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। कहने को तो कागजों पर कैदियों की सेहत का भारी-भरकम बजट खर्च होता है, लेकिन धरातल पर समय पर इलाज न मिल पाना आज एक परिवार के चिराग बुझने का कारण बन गया है। इस घटना ने एक बार फिर जेल के भीतर की व्यवस्थाओं और वहां जारी अघोषित' लापरवाहियों को बड़ी चुनौती दी है।

दोपहर के भोजन के बाद बिगड़ी तबीयत,मचा हड़कंप

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मृतक की पहचान मोहम्मद रियाज (30 वर्ष), निवासी कल्याणपुर के रूप में हुई है, जो पिछले दो वर्षों से जेल में सजा काट रहा था। बताया जा रहा है कि गुरुवार दोपहर करीब 1 बजे खाना खाने के बाद जब रियाज अपने बैरक में आराम कर रहा था, तभी अचानक उसके सीने में तेज दर्द उठा। जेल के भीतर जब तक प्रबंधन सक्रिय हुआ और उसे अस्पताल ले जाने की औपचारिकताएं पूरी की गईं, तब तक रियाज की स्थिति काफी नाजुक हो चुकी थी। सवाल यह उठता है कि क्या जेल के भीतर प्राथमिक उपचार की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो गोल्डन ऑवर (हार्ट अटैक के शुरुआती कीमती मिनट) में कैदी की जान बचा सके?

अस्पताल में 'दूसरा झटका' बना काल, प्रबंधन के दावे फेल

जेल प्रबंधन द्वारा आनन-फानन में रियाज को जिला चिकित्सालय पहुंचाया गया। डॉक्टरों ने शुरुआती जांच के बाद उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे तत्काल आईसीयू (ICU) में शिफ्ट किया। जेल प्रशासन का दावा है कि उपचार के दौरान रियाज को दिल का दूसरा दौरा पड़ा, जो जानलेवा साबित हुआ। डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बावजूद उसे मृत घोषित कर दिया गया। लेकिन यहाँ बड़ा सवाल यह है कि क्या अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों और जीवन रक्षक उपकरणों की उपलब्धता में कोई कमी थी? क्या सरकारी तंत्र केवल मौत का इंतजार करता है या उसे रोकने की सक्रिय कोशिश भी करता है?

प्रशासनिक प्रोटोकॉल या खानापूर्ति?

कैदी की मौत के बाद अब जेल प्रशासन अपनी साख बचाने के लिए प्रोटोकॉल का हवाला दे रहा है। वरिष्ठ अधिकारियों और परिजनों को सूचना दे दी गई है और शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है। प्रशासनिक गलियारों में इसे महज एक 'प्राकृतिक मौत' का रूप देने की कोशिश की जा रही है, लेकिन एक 30 साल के स्वस्थ युवक को जेल के भीतर अचानक ऐसा क्या तनाव या अव्यवस्था मिली कि उसे जान से हाथ धोना पड़ा? जेल के भीतर कैदियों की मानसिक और शारीरिक सेहत की निगरानी पर होने वाले खर्चों की जांच अब अनिवार्य जान पड़ती है।

जवाबदेही से बचता सिस्टम: कब तक बहेगा गरीबों का खून?

जेल अधीक्षक सुनील वैसवाड़े के अनुसार, कैदी सुबह तक पूरी तरह स्वस्थ था और अचानक सीने में दर्द की शिकायत पर उसे अस्पताल भेजा गया। प्रशासन भले ही इसे अचानक हुई घटना" बताकर पल्ला झाड़ ले, लेकिन यह मामला सीधे तौर पर व्यवस्था को चुनौती देता है। क्या जेल की सलाखों के पीछे बंद व्यक्ति के पास जीने का अधिकार नहीं है? जिले के जिम्मेदार अधिकारी इस मुद्दे पर मौन साधे हुए हैं, जबकि अवैध कार्यों और जेल के भीतर की अव्यवस्थाओं को संरक्षण देने वाले तत्वों के हौसले बुलंद हैं।

परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल, उठ रहे जांच की मांग के स्वर

जैसे ही कल्याणपुर में रियाज की मौत की खबर पहुंची, पूरे क्षेत्र में शोक के साथ-साथ आक्रोश की लहर दौड़ गई। परिजनों का आरोप है कि जेल प्रशासन ने समय रहते सही इलाज मुहैया नहीं कराया। 9 फरवरी 2024 को सजा सुनने के बाद से रियाज जेल में बंद था और उसकी सेहत को लेकर पहले कभी ऐसी शिकायत नहीं आई थी। अब सामाजिक कार्यकर्ताओं और परिजनों द्वारा इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच की मांग की जा रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह मौत प्राकृतिक थी या प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही का परिणाम।

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