करोड़ों की 'सफेद हाथी' बनी जयसिंहनगर की नई अस्पताल बिल्डिंग

मरीजों को इलाज नहीं, निजी क्लीनिकों का मिल रहा रास्ता


Junaid Khan - शहडोल। जयसिंहनगर सरकारें स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर तिजोरी खोलकर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं, लेकिन धरातल पर ये पैसे केवल ईंट और पत्थरों की ऊंची इमारतें खड़ी करने तक सीमित रह गए हैं। जयसिंहनगर के आदिवासी बहुल क्षेत्र में ₹10 करोड़ की लागत से बना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) इसका सबसे जीवंत और दुखद उदाहरण है। आलीशान भवन तो तैयार है, लेकिन इसके भीतर की व्यवस्थाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर हैं। यहाँ इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले गरीब आदिवासियों को उपचार के बजाय अव्यवस्था, डॉक्टरों की गैरमौजूदगी और निजी क्लीनिकों का 'पर्चा' थमाया जा रहा है।

बीएमओ का मुख्यालय मोह: अस्पताल राम भरोसे

इस पूरी बदहाली की जड़ प्रशासनिक लापरवाही में छिपी है। जिम्मेदार खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) ने अपनी सुविधा के लिए मुख्यालय जयसिंहनगर के बजाय शहडोल को बना रखा है। जब कप्तान ही मैदान से गायब हो, तो टीम का बिखरना तय है। अधिकारी के मुख्यालय में न रहने के कारण अस्पताल के संचालन पर कोई अंकुश नहीं है, जिसका सीधा खामियाजा दूर-दराज से आने वाले बेबस मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।

कागजों पर 6 डॉक्टर, हकीकत में सन्नाटा 

अभिलेखों के अनुसार, यहाँ छह डॉक्टरों की तैनाती दिखाई गई है। लेकिन हकीकत यह है कि ड्यूटी के समय अधिकांश डॉक्टर अपनी कुर्सियों से नदारद रहते हैं। कुछ डॉक्टर अपने सरकारी आवासों में विश्राम फरमाते हैं, तो कुछ मुख्यालय से गायब रहकर अपनी निजी प्रैक्टिस में मशगूल रहते हैं। रात के समय स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब इमरजेंसी में आए मरीजों को देखने वाला कोई वार्ड बॉय तक नहीं मिलता।

रात 10 बजे का खौफनाक अनुभव: एक पीड़ित की दास्तां

व्यवस्था की संवेदनहीनता का अंदाजा खुसरवाह निवासी बेनीमाधव चतुर्वेदी के मामले से लगाया जा सकता है। बीती रात अपनी नातिन को प्रसव के लिए लेकर वे रात 10 बजे अस्पताल पहुँचे, लेकिन वहां न डॉक्टर मिले और न ही नर्स। मजबूरन उस नाजुक स्थिति में उन्हें मरीज को लेकर शहडोल भागना पड़ा। यह केवल एक बेनीमाधव की कहानी नहीं है, बल्कि जयसिंहनगर क्षेत्र के हर दूसरे परिवार की नियति बन चुकी है।

दंत चिकित्सा के नाम पर सरकारी खजाने की लूट 

अस्पताल में दो दंत चिकित्सकों की संविदा पर नियुक्ति है। इनका मोटा वेतन सरकारी खजाने से नियमित रूप से निकल रहा है, लेकिन दांत के मरीजों को एक साधारण प्राथमिक उपचार तक नसीब नहीं है। चिकित्सकों का रटा-रटाया तर्क है कि "मशीनें उपलब्ध नहीं हैं।" इस बहाने मरीजों को व्यवस्थित रूप से निजी क्लीनिकों की ओर धकेला जा रहा है, जो एक बड़े कमीशन खेल की ओर इशारा करता है।

पट्टी-मल्हम तक गायब, बाजार के भरोसे गरीब

₹10 करोड़ के इस भव्य परिसर में बुनियादी दवाओं और सामग्री का घोर अभाव है। गंभीर रूप से घायल मरीजों के परिजनों को पट्टी, रुई और मल्हम जैसी साधारण चीजें भी बाहर की दुकानों से खरीदकर लानी पड़ रही हैं। "निःशुल्क उपचार" का सरकारी नारा यहाँ के डस्टबिन में पड़ा नजर आता है। अस्पताल प्रशासन की इस चुप्पी ने क्षेत्र के दवा माफियाओं के हौसले बुलंद कर रखे हैं।

मरीजों के लिए लू के थपेड़े, डॉक्टरों के लिए 'एसी' का अहसास

भीषण गर्मी ने आम जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। अस्पताल के वार्डों में भर्ती मरीज बिना पंखे और कूलर के तड़प रहे हैं, लेकिन प्रशासन को उनकी सुध लेने की फुर्सत नहीं है। विडंबना देखिए कि जिन डॉक्टरों को वार्ड में होना चाहिए, उनके चेंबर और आवासीय कक्षों में कूलर पूरी रफ्तार से चल रहे हैं। संवेदनहीनता की यह पराकाष्ठा है कि जहाँ सबसे ज्यादा राहत की जरूरत है, वहीं सबसे ज्यादा उपेक्षा है।

प्यास बुझाने को पानी नहीं, शौच के लिए नर्क जैसे हालात 

अस्पताल परिसर में पीने के पानी की किल्लत एक बड़ी समस्या बन चुकी है। दूर-दराज से आए तीमारदार पानी के लिए भटकने को मजबूर हैं। वहीं, शौचालयों की स्थिति इतनी बदहाल है कि वहां कदम रखना भी दूभर है। स्वच्छता अभियान के नाम पर यहाँ केवल कागजी खानापूर्ति की जा रही है, जबकि जमीनी हकीकत संक्रामक बीमारियों को दावत देने वाली है।

जनप्रतिनिधियों की रहस्यमयी चुप्पी

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस दुर्दशा के लिए केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी बराबर के जिम्मेदार हैं। विधायक और अन्य नेताओं ने अब तक इस अस्पताल की सुध लेना जरूरी नहीं समझा। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता आज आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के इस प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र के आंसू पोंछने के लिए तैयार नहीं हैं।

सवालों के घेरे में 'रेफरल' का धंधा

अस्पताल अब इलाज का केंद्र कम और 'रेफरल सेंटर' ज्यादा बन गया है। बिना किसी ठोस कारण के मरीजों को निजी अस्पतालों या जिला मुख्यालय रेफर कर दिया जाता है। आरोप लग रहे हैं कि इसके पीछे निजी एम्बुलेंस चालकों और निजी क्लीनिकों का एक संगठित गिरोह काम कर रहा है, जो सरकारी अस्पताल को केवल एक ट्रांजिट पॉइंट की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

प्रशासन को खुली चुनौती 

जब इस पूरे मामले पर पक्ष जानने के लिए खंड चिकित्सा अधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। यह चुप्पी इस बात की पुष्टि करती है कि अव्यवस्थाओं को उच्चाधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। अब सवाल यह है कि क्या प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग इस "सफेद हाथी" बन चुके अस्पताल की जांच कराएगा, या फिर गरीबों की जान के साथ यह खिलवाड़ यूँ ही चलता रहेगा? संपादकीय टिप्पणी: सरकारी संसाधनों का ऐसा दुरुपयोग और गरीबों के स्वास्थ्य से ऐसा खिलवाड़ किसी अपराध से कम नहीं है। प्रशासन को अब अपनी कुंभकर्णी नींद से जागना होगा, वरना यह आक्रोश सड़कों पर उतरने में देर नहीं लगाएगा।

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