बस ऑपरेटरों की दबंगई के आगे नतमस्तक परिवहन विभाग, इंजीनियरिंग के छात्र बीच राह 'लावारिस' छोड़ने को मजबूर

कलेक्टर के आदेश हवा, आरटीओ मौन; पक्षीराज और दीपक कंपनी की बसों पर गुंडागर्दी का आरोप, अतिरिक्त किराए के बाद भी छात्रों को कॉलेज तक ले जाने से इंकार


Junaid Khan - शहडोल। संभागीय मुख्यालय से महज छह किलोमीटर दूर स्थित शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के भविष्य के निर्माता आज निजी बस ऑपरेटरों की मनमानी और गुंडागर्दी के शिकार हो रहे हैं। मीडिया' ने जब इस जमीनी हकीकत की पड़ताल की, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। यहाँ बाणगंगा बायपास से गुजरने वाली निजी बसों के कंडक्टर छात्रों को कॉलेज के गेट तक ले जाने के बजाय बीच रास्ते में ही उतार कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

किराया पूरा,सफर अधूरा: छात्रों के साथ अभद्रता 

बाणगंगा बायपास तिराहे पर सुबह के वक्त स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो जाती है। छात्रों का आरोप है कि निजी बसों के कंडक्टर उन्हें कॉलेज ले जाने के नाम पर बस में बैठाने से ही मना कर देते हैं। यदि कोई छात्र अतिरिक्त किराया देने की बात भी करता है, तो कंडक्टर अभद्रता पर उतारू हो जाते हैं। छात्रों ने बताया कि उन्हें दो-टूक कहा जाता है- "जहाँ शिकायत करनी है कर दो, कॉलेज तक नहीं ले जाएंगे"। यह सीधे तौर पर प्रशासन की कार्यप्रणाली को खुली चुनौती है।

पक्षीराज और दीपक कंपनी पर गंभीर आरोप

अमलाई और रीवा रूट पर चलने वाली पक्षीराज और दीपक कंपनी की बसों के खिलाफ छात्रों का गुस्सा फूट रहा है। छात्रों के अनुसार, वे किराया देने के बावजूद इन बसों में बैठने के लिए तरसते हैं। कंडक्टर उन्हें पहचान कर कोनी के पास बीच सड़क पर उतार देते हैं, जिससे छात्रों को मजबूरन ऑटो बुक कर या पैदल कॉलेज पहुंचना पड़ता है। इससे न केवल उनका समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।

10 रुपये का नियम बना 'कागजी शेर' 

पूर्व में बस संचालकों और प्रशासन के बीच हुई बैठक में यह तय किया गया था कि इंजीनियरिंग कॉलेज जाने वाले छात्रों से केवल 10 रुपये किराया लिया जाएगा। लेकिन आज यह नियम केवल कागजों तक सीमित रह गया है। धरातल पर बस ऑपरेटर अपनी मनमर्जी का किराया वसूल रहे हैं और छात्रों को अपमानित कर बीच सड़क पर उतार रहे हैं। आखिर किसके संरक्षण में ये ऑपरेटर सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं?

कॉलेज प्रबंधन की बेबसी या लापरवाही?

इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर अमिताभ मिश्रा ने स्वीकार किया कि छात्रों की यह समस्या लंबे समय से उनके संज्ञान में है। परिवहन विभाग को इस संबंध में कई बार पत्राचार भी किया गया, लेकिन कुंभकर्णी नींद में सोए विभाग ने आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, जब छात्र बीच सड़क पर उतारे जाने के कारण किसी दुर्घटना का शिकार होंगे?

सीएम हेल्पलाइन भी बेअसर

प्रशासनिक दावों की पोल तब खुलती है जब छात्र बताते हैं कि उन्होंने सीएम हेल्पलाइन और कॉलेज प्रबंधन से बार-बार गुहार लगाई, लेकिन नतीजा 'सिफर' रहा। सरकारी तंत्र की इस विफलता ने बस ऑपरेटरों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि उन्हें कानून का जरा भी डर नहीं रह गया है।

प्रशासन को 'मीडिया' की चुनौती

यह खबर केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों के लिए चेतावनी है जो अपनी एयरकंडीशंड गाड़ियों में बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर करते हैं। अगर जल्द ही इन दबंग बस ऑपरेटरों के परमिट निरस्त नहीं किए गए और छात्रों को कॉलेज के गेट तक सुरक्षा और सम्मान के साथ पहुँचाने की व्यवस्था नहीं हुई, तो छात्र उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे।

परिवहन विभाग की चुप्पी पर सवाल 

क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO) इस पूरे मामले में मौन साधे हुए हैं। क्या विभाग को इन निजी कंपनियों की अवैध वसूली और अभद्रता की जानकारी नहीं है? या फिर 'सांठगांठ' के चलते छात्रों के हितों की बलि चढ़ाई जा रही है? इन कंपनियों की बसों की जांच और कंडक्टरों के व्यवहार पर कड़ी निगरानी की दरकार है।

अब निर्णायक कार्रवाई की बारी 

इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र कल के इंजीनियर हैं, जो देश बनाएंगे। लेकिन आज वे सड़क पर खड़े होकर बस के आगे गिड़गिड़ा रहे हैं। 'मीडिया' इस मुद्दे को तब तक उठाता रहेगा जब तक छात्रों को उनका हक नहीं मिल जाता। प्रशासन को अब यह तय करना होगा कि वह छात्रों के साथ खड़ा है या नियम तोड़ने वाले माफियाओं के साथ।

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