प्रशासनिक तंत्र की नाक के नीचे 'जल समाधि' की तैयारी, स्टे के बावजूद बिक गए प्लॉट; अब अवमानना की तलवार
Junaid Khan - शहडोल। सत्ता और रसूख के नशे में चूर भू-माफियाओं ने शहडोल के प्राकृतिक स्वरूप को छलनी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ताज़ा मामला सोहागपुर तहसील के ग्राम फतेहपुर का है, जहाँ 'ग्रीन वैली' नामक कॉलोनी ने न केवल सरकारी नियमों को ताक पर रख दिया है, बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्थाओं में से एक, माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों को भी रद्दी का टुकड़ा समझ लिया है। खसरा क्रमांक 60/186 की शासकीय नाले की भूमि पर अवैध कब्जे का यह खेल अब एक बड़े प्रशासनिक घोटाले की ओर इशारा कर रहा है।
कोर्ट का 'यथास्थिति' आदेश और माफिया की मनमानी
हैरत की बात यह है कि जिस भूमि को लेकर वर्ष 2021 में माननीय उच्च न्यायालय, जबलपुर ने 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखने का स्पष्ट आदेश पारित किया था, उसी जमीन पर रातों-रात ईंट-गारों की दीवारें खड़ी कर दी गईं। यह केवल अतिक्रमण नहीं, बल्कि न्यायपालिका की सीधी अवमानना है। जब न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि यहाँ कोई बदलाव नहीं होगा, तो फिर किसके संरक्षण में वहां निर्माण कार्य जारी रहा?
भोली-भाली जनता के साथ 'विधिक धोखाधड़ी'
कॉलोनाइजरों ने न केवल सरकारी जमीन पर डाका डाला, बल्कि उन आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई पर भी सेंध लगाई है जो एक अदद आशियाने का सपना देख रहे थे। 'स्टेटस को' (Status Quo) के तथ्य को छिपाकर प्लॉट और मकानों की धड़ल्ले से बिक्री करना 'कानूनी छल' और 'धोखाधड़ी' की पराकाष्ठा है। भविष्य में अगर कोर्ट का डंडा चलता है, तो इन मासूम खरीदारों का क्या होगा?
क्या प्रशासन उनकी बर्बादी का जिम्मेदार होगा?
कलेक्टर और एसडीएम की 'मौन' सहमति पर सवाल? इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस विवादित मामले में स्वयं कलेक्टर शहडोल और अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) सोहागपुर पक्षकार रहे हैं। जब जिले के शीर्ष अधिकारी स्वयं न्यायालयीन प्रक्रिया का हिस्सा हैं, तो यह कैसे संभव है कि उनकी जानकारी के बिना सरकारी नाले पर पूरी कॉलोनी खड़ी हो गई? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें?
अधिवक्ता सुमित दुबे ने खोला मोर्चा
इस अवैध साम्राज्य के खिलाफ अधिवक्ता सुमित दुबे ने विधिक मोर्चा खोलते हुए संभागायुक्त और कलेक्टर को लिखित शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि जब प्रशासन को कोर्ट के आदेश की जानकारी थी, तो उन्होंने निर्माण रुकवाने के लिए बल प्रयोग क्यों नहीं किया? अब मांग उठी है कि कॉलोनाइजर के विरुद्ध तत्काल 'कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट' (Contempt of Court) के तहत मामला दर्ज कराया जाए।
प्राकृतिक आपदा को खुला निमंत्रण: डूबेगा शहर?
पर्यावरण की दृष्टि से यह अपराध अक्षम्य है। नाले की भूमि जल निकासी का प्राकृतिक मार्ग होती है। 'ग्रीन वैली' के निर्माण ने इस मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है। आने वाले समय में क्षेत्र में भारी जलभराव और बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा होना तय है। माफिया तो मुनाफा कमाकर निकल जाएंगे, लेकिन स्थानीय जनता को इस प्रशासनिक चूक का खामियाजा 'जलभराव' के रूप में भुगतना होगा।
शिकायत के बाद प्रशासन में मची खलबली
अधिवक्ता की इस शिकायत ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। सूत्रों की मानें तो राजस्व विभाग के कई अधिकारी अब अपनी गर्दन बचाने के लिए फाइलों को खंगाल रहे हैं। सवाल यह है कि जब नाला राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है, तो उसका डायवर्सन और एनओसी कैसे मिल गई? क्या यह पूरी फाइल ही फर्जीवाड़े की बुनियाद पर खड़ी है?
प्रशासन को सीधी चुनौती: क्या चलेगा 'बुलडोजर'?
प्रदेश में एक ओर अवैध अतिक्रमण पर मामा का बुलडोजर चलने की बातें होती हैं, वहीं दूसरी ओर शहडोल के फतेहपुर में सरकारी नाले को निगला जा रहा है। क्या जिला प्रशासन में इतनी इच्छाशक्ति है कि वह इस 'ग्रीन वैली' के अवैध साम्राज्य को ढहाकर हाईकोर्ट के आदेश की गरिमा बहाल करे? या फिर कागजी खानापूर्ति कर भू-माफियाओं को अभयदान दे दिया जाएगा?
दंडात्मक कार्रवाई की बढ़ती मांग
स्थानीय बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि केवल अतिक्रमण हटाना काफी नहीं है। दोषियों के विरुद्ध वैधानिक और दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। शासकीय भूमि की हेराफेरी करने वाले कॉलोनाइजरों की संपत्तियां कुर्क की जाएं और उन अधिकारियों पर भी गाज गिरे जिन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर इस अवैध निर्माण को होने दिया।
खबर का असर: अब आर-पार की जंग
पिछले दिनों इस मामले की सुगबुगाहट जैसे ही प्रेस में आई, प्रशासन ने आनन-फानन में जांच की बात तो कही है, लेकिन धरातल पर अब तक एक ईंट भी नहीं हिली है। यह खबर उन तमाम भ्रष्ट चेहरों को बेनकाब करने की दिशा में एक बड़ा प्रहार है। अब देखना यह है कि शहडोल प्रशासन न्याय के साथ खड़ा होता है या 'सिस्टम' को अपनी जेब में रखने वाले माफियाओं के साथ।
निष्कर्ष: जनता की अदालत में प्रशासन लोकतंत्र में जनता और कानून सर्वोपरि हैं। यदि एक शासकीय नाले की जमीन पर अवैध कॉलोनी तन सकती है, तो यह आम आदमी के भरोसे की हत्या है। अधिवक्ता सुमित दुबे द्वारा उठाए गए कदम ने प्रशासन को आईना दिखा दिया है। अब गेंद कलेक्टर शहडोल के पाले में है। न्याय होगा या फाइलें फिर से ठंडे बस्ते में जाएंगी?

