गोहपारू थाने के मुंशी पर जातिगत भेदभाव और दबंगों को संरक्षण देने का आरोप; न्याय के लिए दर-दर भटक रही बेबस महिला
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में कानून व्यवस्था के दावों की धज्जियाँ उड़ाता एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहाँ गोहपारू थाना क्षेत्र के ग्राम बरमानिया में एक असहाय महिला उषा सिंह और उसके परिवार पर न केवल जानलेवा हमला हुआ, बल्कि पुलिस प्रशासन ने संवेदनहीनता की सारी हदें पार करते हुए न्याय के दरवाजे भी बंद कर दिए। मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू थाने के मुंशी ज्ञान सिंह का वह बयान है, जिसने खाकी की कार्यप्रणाली पर गहरा कलंक लगा दिया है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि शिकायत लेकर पहुँचने पर मुंशी ने दो टूक कहा जब तक हाथ-पैर नहीं टूटेंगे, तब तक पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करेगी।
दबंगों का तांडव: पट्टे की जमीन पर ढहाया आशियाना
घटना की शुरुआत ७ फरवरी २०२६ को हुई, जब ग्राम सरपंच दलप्रताप सिंह के नेतृत्व में जगन्नाथ, बैजनाथ, जगदीश, वाल्मीक और श्यामदीन नामक दबंगों ने प्रार्थी उषा सिंह के पट्टे की भूमि (खसरा नं. ६९७) पर बने पुराने मड़ैया (कच्चे घर) को जबरन ध्वस्त कर दिया। इस दौरान दबंगों ने प्रार्थी और उनके परिवार के साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट की, जिसमें परिवार के तीन सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए। हैरानी की बात यह है कि सरेआम हुई इस गुंडागर्दी के बावजूद पुलिस ने केवल कागजी खानापूर्ति (MLC) कर अपना पल्ला झाड़ लिया।
प्रशासन को खुली चुनौती: स्थगन आदेश के बाद भी जान से मारने की धमकी
प्रशासनिक शिथिलता का आलम यह है कि तहसीलदार गोहपारू द्वारा विवादित भूमि पर स्थगन आदेश (Stay Order) जारी होने के बावजूद दबंगों के हौसले बुलंद हैं। १३ मार्च २०२६ को आरोपियों ने पुनः प्रार्थी के घर के पास अवैध कब्जा करने की कोशिश की। जब उषा सिंह ने इसका विरोध किया, तो उन्हें सरेआम जान से मारने की धमकी दी गई। आरोपियों ने खौफनाक लहजे में कहा कि "मुंशी जी से हमारी बात हो गई है, जैसे तुम्हारी सास का मर्डर कर दिए थे, वैसे ही तुम्हें भी मारकर फेंक देंगे।" यह बयान स्पष्ट करता है कि अपराधियों को कानून का नहीं, बल्कि पुलिस के संरक्षण का भरोसा है।
खाकी पर 'जातिवाद' का दाग
झूठे केस में फंसाने की साजिश इस पूरे मामले में गोहपारू थाने के मुंशी ज्ञान सिंह की भूमिका संदिग्ध और पक्षपाती नजर आ रही है। प्रार्थी का आरोप है कि मुंशी और आरोपी पक्ष एक ही जाति के हैं, जिसके कारण न्याय प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा है। पीड़ित परिवार का कहना है कि मुंशी ज्ञान सिंह उनके साथ न केवल जातिगत भेदभाव करते हैं, बल्कि उनके दामाद (कुशवाहा जाति) को एससी/एसटी (SC/ST) एक्ट के झूठे मामले में फंसाने की धमकी भी दे रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि रक्षक ही अब भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं।
दहशत के साये में जीने को मजबूर परिवार
पिछले कई महीनों से न्याय की गुहार लगा रही उषा सिंह अब न्याय के लिए पुलिस महानिरीक्षक (IG) शहडोल की शरण में पहुँची हैं। प्रार्थी ने अपनी शिकायत में स्पष्ट किया है कि मुंशी की शह पर आरोपी लगातार उन पर दबाव बना रहे हैं। पूरा परिवार इस समय अत्यंत भय और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर है। सवाल यह उठता है कि क्या शहडोल संभाग में न्याय की उम्मीद केवल तब की जा सकती है जब कोई बड़ी अनहोनी हो जाए? क्या पुलिस किसी की जान जाने का इंतजार कर रही है?
प्रशासन के लिए खड़े होते तीखे सवाल:
१.क्या स्थगन आदेश (Stay Order) की धज्जियाँ उड़ाने वाले दबंगों के खिलाफ कार्रवाई न करना न्यायालय की अवमानना नहीं है?
२.एक लोक सेवक (मुंशी) द्वारा खुलेआम भेदभाव और धमकी देना क्या वर्दी की गरिमा के खिलाफ नहीं है?
३.आखिर क्यों पीड़ित परिवार की गुहार पर अब तक एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की गई?
४.क्या जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक महोदय इस मामले में संज्ञान लेकर दोषी मुंशी और दबंगों पर कठोर कार्रवाई करेंगे?
इस खबर के प्रकाशित होने के बाद अब गेंद प्रशासन के पाले में है। यदि जल्द ही पीड़ित पक्ष को सुरक्षा और न्याय नहीं मिला, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिले में 'कानून का राज' नहीं बल्कि 'दबंगों और भ्रष्ट मुलाजिमों का गठजोड़' चल रहा है। संलग्न साक्ष्य: पीड़ित महिला ने शिकायत के साथ अस्पताल की MLC रिपोर्ट, NCR की प्रति और पुलिस अधीक्षक को दिए गए पूर्व आवेदन की प्रतियाँ भी संलग्न की हैं, जो पुलिसिया लापरवाही का जीवंत प्रमाण हैं।
