प्रशासनिक ढर्रे पर करारा तमाचा,साहब 'वीसी' के बहाने नदारद, बाबू मार रहे कुंडलियां

सूने पड़े दफ्तर दे रहे सरकारी दावों को चुनौती 


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए ऑनलाइन हाजिरी से लेकर बायोमेट्रिक सिस्टम जैसे तमाम तामझाम और कड़े नियम कागजों पर दौड़ाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट शहडोल प्रशासनिक हब की नाक के नीचे दम तोड़ रही है। कलेक्ट्रेट परिसर के ठीक पीछे और एसडीएम कार्यालय के ठीक सामने संचालित 'ग्रामीण यांत्रिकी सेवा' (आरईएस) कार्यालय में समय की पाबंदी का सरेआम मखौल उड़ाया जा रहा है। गुरुवार सुबह 11 बजे तक जब पूरा प्रशासनिक अमला अपनी सीटों पर मुस्तैद होना चाहिए था, तब आरईएस के कार्यपालन यंत्री (ईई) के कक्ष सहित समूचे दफ्तर की कुर्सियां और टेबलें धूल फांकती नजर आईं। जनता अपने काम के लिए भटक रही थी और दफ्तर में केवल दो ऑफिस सहायक सुरेश गुप्ता और पुष्पेंद्र ही मौजूद मिले, बाकी पूरा स्टाफ शासकीय समय की धज्जियां उड़ाते हुए गायब था। यह केवल एक दिन की लेटलतीफी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान है कि जब एसडीएम और कलेक्टर की परछाई के नीचे रहने वाले विभागों का यह हाल है, तो दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों में जनता के प्रति इन अफसरों की जवाबदेही क्या होगी? जब इस गंभीर लापरवाही को लेकर आरईएस के कार्यपालन यंत्री (ईई) के.पी. पटेल से सीधा सवाल दागा गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह एक घिसा-पिटा और ढुलमुल बहाना आगे कर दिया कि वे 'वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग' (वीसी) में व्यस्त थे। सवाल यह उठता है कि क्या साहब की वीसी के चक्कर में पूरा दफ्तर बंद हो जाएगा? समय पर अपनी ड्यूटी से नदारद रहने वाले कर्मचारियो अजय नामदेव, अनिल कोल, आलोक शुक्ला और लाल बहादुर पटेल की यह गैर-जिम्मेदारी साफ दर्शाती है कि इन्हें न तो शासन के आदेशों का खौफ है और न ही जनता की समस्याओं से कोई सरोकार। हालांकि, मामले के तूल पकड़ते ही साहब ने अनुपस्थित कर्मचारियों पर कार्रवाई करने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है, लेकिन देखना यह होगा कि यह महज एक कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है या फिर इन लापरवाह बाबुओं और खुद साहब की कुर्सी पर कोई ठोस प्रशासनिक चाबुक चलता है।

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