पीएम के सराहे विचारपुर के फुटबॉल सितारे प्रशासनिक उपेक्षा और नेताओं के खोखले दावों के बीच लहूलुहान होने को मजबूर
Junaid Khan - शहडोल। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस गांव के खेल जुनून की मुरीद हो चुके हैं और जिस माटी की चमक जर्मनी तक अपनी धाक जमा चुकी है, वह ‘मिनी ब्राजील’ नाम से विख्यात विचारपुर गांव आज स्थानीय जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों और जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों की घोर लापरवाही का शिकार है। एक तरफ विचारपुर के नन्हे और युवा खिलाड़ी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में उबड़-खाबड़, गंदे व पथरीले मैदान पर नंगे पांव पसीना बहाकर अपनी अटूट निष्ठा और अदम्य साहस का परिचय दे रहे हैं; वहीं दूसरी ओर खेल विभाग और जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी 5 करोड़ 10 लाख रुपये की मोटी वित्तीय राशि स्वीकृत होने के बावजूद केवल खानापूर्ति और जुमलेबाजी में व्यस्त हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जुलाई 2023 को अपने शहडोल दौरे के दौरान इन होनहारों से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया था और 30 जुलाई 2023 को 'मन की बात' के 103वें एपिसोड में विचारपुर के खेल कल्चर की जमकर तारीफ की थी। बावजूद इसके, सत्ता में बैठे नेताओं और वातानुकूलित कमरों में बैठे अफसरों की कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि जनता और खिलाड़ियों की उपलब्धियां तो केवल वाहवाही लूटने और मंचों से भाषण देने का माध्यम बनकर रह गई हैं।
जिम्मेदारों की सुस्ती से जमीनी धरातल पर धूल फांक रहीं योजनाएं
विधायक मनीषा सिंह द्वारा 3 सितंबर 2025 को खेल मंत्री विश्वास कैलाश सारंग को ज्ञापन सौंपने के बाद, 12 मार्च को खेलो इंडिया स्मॉल सेंटर के तहत विचारपुर में फुटबॉल ग्राउंड, बाउंड्री वाल, चेंजिंग रूम, पवेलियन और ऑफिशियल रूम निर्माण हेतु 5 करोड़ 10 लाख रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई थी। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य का एक ढेला तक नहीं हिला है। जब भी इस संबंध में विभागीय अधिकारियों और जिम्मेदार अमले से सवाल किया जाता है, तो हमेशा की तरह "दिखवाते हैं कि क्या समस्या है" जैसा रटा-रटाया जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। बारिश के इस मौसम में मैदान गड्ढों, गोबर, कीचड़ और धूल से पटा पड़ा है, जहां बच्चे अभ्यास करने से पहले खुद हाथों से सफाई करते हैं। साई स्मॉल सेंटर की कोच लक्ष्मी सहीस और कोच शंकर दहिया तथा स्थानीय खिलाड़ी दुर्गेश सिंह, विजय बैगा व सिमरन बैगा बताते हैं कि चार-पांच सालों से वे इस पथरीली जमीन पर गिरकर चोटिल हो रहे हैं और हफ्तों खेल से दूर रहने को मजबूर हैं। इसके बाद भी 3 से 20 साल के बच्चों का हौसला कम नहीं हुआ है और वे बिना जूतों के भी देश का नाम रोशन करने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की यह आपराधिक खामोशी अब सवाल खड़े कर रही है कि आखिर कब तक ये होनहार प्रतिभाएं कागजी स्वीकृतियों के सहारे पथरीले धरातल पर अपना खून-पसीना बहाती रहेंगी?
