फर्जी दस्तावेज और अनुकंपा नियुक्ति मामला,कोर्ट ने सभी आरोपियों को किया बाइज्जत बरी

बीएमओ व विभागीय जांच की हवा निकली,वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषिकांत गुप्ता की दलीलों के आगे पस्त हुआ अभियोजन पक्ष


Junaid Khan - शहडोल। उमरिया शासकीय सेवा में अनुकंपा नियुक्ति के नाम पर फर्जीवाड़े और झूठा शपथ पत्र देने के गंभीर आरोपों से घिरे मामले में न्यायपालिका ने एक बार फिर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बिरसिंहपुर पाली (जिला उमरिया) की न्यायालय ने प्रस्तुत साक्ष्यों व गवाहों का गहन परीक्षण करने के बाद मामले के मुख्य अभियुक्त अखिलेश कुमार दुबे, उनकी माता पूर्व शिक्षिका श्रीमती शशिप्रभा दुबे, एएसआई अरविंद कुमार दुबे सहित सभी 06 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में पूर्णतः दोषमुक्त (बरी) करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह पूरा मामला वर्ष 2011-12 में सहायक शिक्षक स्व. रमेश प्रसाद शर्मा के निधन के पश्चात उनके पुत्र अखिलेश दुबे द्वारा दी गई अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा हुआ था। अभियोजन का आरोप था कि माता के पूर्व से ही शासकीय सेवा में होने के बावजूद गलत शपथ पत्र प्रस्तुत कर षड्यंत्रपूर्वक अनुकंपा नियुक्ति हासिल की गई। मामले में तत्कालीन विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों ललन सिंह बनाफर, अशोक सिंह एवं वासुदेव धुर्वे को भी आरोपी बना दिया गया था। हालांकि, पूरे केस की सुनवाई के दौरान पुलिस जांच की गंभीर कमियां और विभागीय जांच अधिकारियों की लापरवाही परत-दर-परत अदालत के सामने उजागर होती चली गईं।

वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषिकांत गुप्ता की दमदार पैरवी ने पलटा पासा 

इस पूरे चर्चित व जटिल आपराधिक प्रकरण में शहडोल संभाग के वरिष्ठ एवं ख्यातिलब्ध अधिवक्ता ऋषिकांत गुप्ता ने आरोपी पक्ष की ओर से पैरवी करते हुए अपनी अद्वितीय कानूनी सूझबूझ, तथ्यपरक दलीलों और कड़े प्रतिपरीक्षण (Cross-Examination) का परिचय दिया। अधिवक्ता ऋषिकांत गुप्ता ने अदालत के समक्ष ठोस दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए साबित किया कि अनुकंपा नियुक्ति के मूल आवेदन में ही माता के शिक्षिका होने की जानकारी स्पष्ट रूप से दर्ज थी और किसी भी प्रकार का कोई वास्तविक तथ्य छिपाया ही नहीं गया था। उन्होंने अभियोजन पक्ष के गवाहों व जांच अधिकारियों की गवाही में मौजूद विरोधाभासों को न्यायालय के समक्ष प्रमुखता से रखा। अधिवक्ता गुप्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि विभागीय नियमों के भ्रम और आधी-अधूरी जांच के आधार पर निर्दोष परिजनों व कर्मचारियों पर फर्जीवाड़े का झूठा केस मढ़ दिया गया था। उनकी इस प्रभावशाली न्यायालयीन पैरवी और मजबूत कानूनी तर्कों को ही इस मामले में सभी आरोपियों की बाइज्जत दोषमुक्ति का सबसे मुख्य आधार माना जा रहा है।

आधी-अधूरी जांच और लापरवाही पर उठा सवाल,न्यायपालिका ने कायम रखी न्याय की मिसाल

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उपलब्ध दस्तावेजों का सूक्ष्मता से मूल्यांकन किया और पाया कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र (धारा 120-बी) या धोखाधड़ी (धारा 420) का आरोप "संदेह से परे" सिद्ध करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। जांच अधिकारियों द्वारा बिना किसी ठोस अधिकार-पत्र के तैयार की गई निरीक्षण रिपोर्ट और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों की अवहेलना करते हुए बिना विभागीय अनुमति के दर्ज किए गए इस केस ने पुलिस व प्रशासनिक प्रणाली की कार्यशैली पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत के इस निष्पक्ष और न्यायपूर्ण फैसले की सर्वत्र सराहना हो रही है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले ने न केवल झूठे व गैर-जिम्मेदाराना आरोपों के कारण वर्षों तक मानसिक संताप झेलने वाले परिवार को राहत दिलाई है, बल्कि बिना गहराई से जांच किए विभागीय और आपराधिक प्रकरण दर्ज करने वाले लापरवाह तंत्र को भी एक कड़ा संदेश दिया है। कोर्ट के इस निर्णय को निष्पक्ष न्याय का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जा रहा है।

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