साढ़े सात एकड़ में बनना था ‘क्राफ्ट कैफेटेरिया’,50 लाख की स्वीकृति के बावजूद अटका प्रोजेक्ट

भूमि आवंटन के बाद भी नहीं बढ़ी प्रक्रिया, कृषि छात्रों को नहीं मिल रहा प्रायोगिक लाभ 


Junaid Khan - शहडोल। पं. शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय में कृषि शिक्षा को आधुनिक और प्रायोगिक बनाने के लिए प्रस्तावित “क्राफ्ट कैफेटेरिया” परियोजना अब भी अधर में लटकी हुई है। करीब साढ़े सात एकड़ भूमि आवंटन और डीएमएफ मद से 50 लाख रुपए स्वीकृत होने के बावजूद अब तक राशि जारी नहीं हो सकी है, जिससे पूरी प्रक्रिया ठप पड़ी है। इसका सीधा असर बीएससी एग्रीकल्चर के छात्रों की पढ़ाई और उनके प्रैक्टिकल प्रशिक्षण पर पड़ रहा है। भूमि मिली, लेकिन काम नहीं बढ़ा। विश्वविद्यालय प्रबंधन के अनुसार कृषि क्राफ्ट एरिया विकसित करने के लिए पर्याप्त भूमि पहले ही चिन्हित और आवंटित की जा चुकी है। इस क्षेत्र में स्प्रिंकलर पाइपलाइन, फेंसिंग, भूमि समतलीकरण और ग्रीन हाउस निर्माण जैसी योजनाएं प्रस्तावित थीं, ताकि छात्रों को आधुनिक कृषि तकनीकों का सीधा अनुभव मिल सके। लेकिन जमीन मिलने के बाद भी कार्य आगे नहीं बढ़ पाया, जिससे परियोजना कागजों तक सीमित रह गई है। राशि स्वीकृत, पर जारी नहीं सबसे बड़ा अड़ंगा। क्राफ्ट कैफेटेरिया के निर्माण के लिए डीएमएफ (District Mineral Foundation) से करीब 25-25 लाख रुपए के दो प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे। बावजूद इसके प्रशासनिक स्तर पर राशि जारी नहीं होने से काम शुरू ही नहीं हो पाया। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने कई बार जिला प्रशासन के समक्ष यह मुद्दा उठाया, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है। छात्रों का आरोप सिर्फ किताबों तक सीमित पढ़ाई कृषि संकाय के छात्रों का कहना है कि विभाग में न तो पर्याप्त सुविधाएं हैं। न ही नियमित प्रायोगिक प्रशिक्षण की व्यवस्था और फील्ड वर्क के लिए जरूरी संसाधनों का अभाव। छात्रों के अनुसार, क्राफ्ट कैफेटेरिया बन जाने से उन्हें खेत स्तर पर नई तकनीकों को सीखने और प्रयोग करने का मौका मिलता, जो अभी नहीं मिल पा रहा है। शिकायत पत्र में उठाए गए प्रमुख बिंदु। छात्र संगठन और संबंधित प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए शिकायत पत्र में कई गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। क्राफ्ट कैफेटेरिया निर्माण की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी। स्वीकृत राशि का समय पर आवंटन न होना। कृषि छात्रों के लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण का अभाव। विश्वविद्यालय द्वारा बार-बार मांग के बावजूद कार्रवाई न होना। छात्रों के भविष्य और रोजगार पर पड़ रहा नकारात्मक प्रभाव। छात्रों ने प्रशासन से मांग की है कि शीघ्र राशि जारी कर निर्माण कार्य शुरू कराया जाए।

क्या है ‘क्राफ्ट कैफेटेरिया’ और क्यों है जरूरी। क्राफ्ट कैफेटेरिया कोई साधारण कैंटीन नहीं, बल्कि यह एक प्रायोगिक कृषि क्षेत्र (डेमो फार्म) होता है, जहां आधुनिक खेती तकनीक

जैविक कृषि सिंचाई प्रणाली

उन्नत फसल उत्पादन जैसे विषयों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है। इससे छात्रों को किताबों के साथ-साथ खेत में काम करने का अनुभव भी मिलता है। प्रबंधन का पक्ष। विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि। राशि जारी होते ही कार्य शुरू करा दिया जाएगा। प्रशासन से लगातार संपर्क में हैं और जल्द समाधान की उम्मीद है। बड़ा सवाल जिम्मेदारी कौन लेगा? लगातार देरी के कारण अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर परियोजना अटक क्यों रही है?

स्वीकृत बजट के बावजूद काम क्यों नहीं शुरू हुआ? और छात्रों के नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा? यदि जल्द ही निर्णय नहीं लिया गया, तो यह महत्वपूर्ण परियोजना केवल फाइलों में ही सिमटकर रह जाएगी और कृषि छात्रों का भविष्य प्रभावित होता रहेगा। निष्कर्ष। कृषि जैसे व्यावहारिक विषय में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में “क्राफ्ट कैफेटेरिया जैसी परियोजना का अटकना न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही दर्शाता है, बल्कि यह सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रबंधन इस पर कितनी जल्दी ठोस कदम उठाते हैं।

Previous Post Next Post