शादियों के सीजन में कैश के लिए दर-दर भटकते रहे नागरिक; बंद पड़े एटीएम और खाली मशीनों ने खोली डिजिटल इंडिया के दावों की पोल
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के इस हृदय स्थल पर बैंकिंग सेवाओं की जो बदहाली पिछले कुछ दिनों से देखी जा रही थी, उसने प्रशासन और बैंक प्रबंधन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। शहर के प्रमुख चौराहों पर लगे शो-पीस बन चुके एटीएम मशीनों ने आम जनता को जिस मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से गुजारा है, वह किसी गंभीर अपराध से कम नहीं है। बैंकिंग लोकपाल और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बैंक अधिकारियों ने जनता को उनके ही हक के पैसों के लिए मोहताज कर दिया था।
खबर का असर: कुंभकर्णी नींद से जागा प्रबंधन
लगातार जन-शिकायतों और क्षेत्र में व्याप्त आक्रोश को देखते हुए जब इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, तब जाकर प्रशासन और बैंक प्रबंधन की कुंभकर्णी नींद टूटी। खबर के माध्यम से सिस्टम की विफलता को उजागर करने के बाद ही आनन-फानन में मशीनों को सुधारने का काम शुरू हुआ। यह स्पष्ट है कि यदि मीडिया अपनी भूमिका प्रखरता से न निभाए, तो जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सियों से हिलने का नाम तक नहीं लेते।
शादियों के सीजन में 'नकदी' का सूखा
वर्तमान में वैवाहिक सीजन का जोर है। ऐसे समय में जब हर परिवार को नकदी की नितांत आवश्यकता होती है, शहर के प्रमुख एटीएम का बंद होना किसी साजिश से कम प्रतीत नहीं होता। लोगों को अपनी जरूरतों के लिए एक एटीएम से दूसरे और दूसरे से तीसरे एटीएम के चक्कर लगाने पड़ रहे थे। यह विडंबना ही है कि एक ओर सरकार डिजिटल ट्रांजेक्शन और कैशलेस इकोनॉमी की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि जनता अपने ही जमा धन को निकालने के लिए घंटों पसीना बहा रही है।
इन प्रमुख चौराहों पर दिखा 'सिस्टम का सन्नाटा'
नगर के सबसे व्यस्ततम इलाके जयस्तंभ चौक, गांधी चौक, शेर चौक और बुढ़ार चौक जैसे क्षेत्रों में एटीएम की स्थिति दयनीय बनी हुई थी। इन क्षेत्रों में न केवल एटीएम मशीनें खराब थीं, बल्कि जो मशीनें तकनीकी रूप से ठीक थीं, उनमें कैश की उपलब्धता शून्य थी। आखिर क्यों इन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर कैश प्रबंधन को नजरअंदाज किया गया? क्या यह प्रबंधन की अक्षमता है या फिर जानबूझकर की गई लापरवाही?
प्रबंधन की स्वीकारोक्ति और अधूरी तैयारी,जब दबाव बढ़ा तो बैंक प्रबंधन ने दबी जुबान में अपनी गलती स्वीकार की। उन्होंने माना कि कुछ तकनीकी कारणों से मशीनें बंद थीं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रबंधन को इन तकनीकी खामियों का पता तब चलता है जब जनता त्राहि-त्राहि करने लगती है? यह स्थिति स्पष्ट रूप से बैंक प्रबंधन के 'इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम' की विफलता को दर्शाती है। खरीदारी और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित एटीएम में नकदी न होने का सीधा असर शहर के स्थानीय व्यापार पर पड़ा है। शादियों की खरीदारी के लिए बाजार आए लोग नकदी के अभाव में बैरंग लौटने को मजबूर हुए। इससे न केवल ग्राहकों को परेशानी हुई, बल्कि व्यापारियों का कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। बैंकिंग सेवाओं की इस अव्यवस्था ने आर्थिक चक्र को भी कुछ समय के लिए थाम दिया था।
भ्रष्ट कार्यप्रणाली और अवैध सांठगांठ की बू
क्या एटीएम मशीनों का जानबूझकर बंद रहना किसी 'अदृश्य खेल' का हिस्सा है? अक्सर देखा गया है कि जब मुख्य एटीएम बंद होते हैं, तो कुछ निजी एजेंट या बिचौलिये सक्रिय हो जाते हैं। प्रशासन को इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि क्या यह कृत्रिम अभाव किसी विशेष लाभ के लिए पैदा किया गया था? अवैध रूप से नकदी निकालने वाले केंद्रों की चांदी होने के पीछे कहीं बैंकों की यह 'खराबी' ही तो वजह नहीं? जनता की राहत या सिर्फ औपचारिकता? मीडिया की सख्ती के बाद पिछले दो-तीन दिनों में अधिकांश एटीएम से कैश निकलने लगा है। जनता ने राहत की सांस तो ली है, लेकिन मन में अभी भी यह शंका बनी हुई है कि क्या यह सुधार स्थायी है? बैंक प्रबंधन का दावा है कि स्थिति अब नियंत्रण में है, लेकिन नागरिकों की मांग है कि ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
प्रशासन को सीधी चुनौती
यह खबर उन तमाम अधिकारियों के लिए एक खुली चुनौती है जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर 'सुशासन' के दावे करते हैं। जनता की बुनियादी सुविधाओं से खिलवाड़ करने वाले ऐसे तत्वों को चिन्हित कर उन पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि बैंक अपने ग्राहकों को समय पर सेवाएं देने में अक्षम हैं, तो उन पर भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान सुनिश्चित होना चाहिए। निष्कर्ष: जागरूक पत्रकारिता ही अंतिम समाधान। अंततः, यह पूरी घटना सिद्ध करती है कि जब तक मीडिया शासन और प्रशासन के विरुद्ध डंडा नहीं उठाता, तब तक आम जन की सुनवाई नहीं होती। खबर के असर से एटीएम तो शुरू हो गए हैं, लेकिन बैंकिंग व्यवस्था की यह जड़ता भविष्य के लिए एक बड़ा सबक है। अब समय आ गया है कि जनता और प्रशासन मिलकर ऐसे 'सिस्टम फेलियर' के खिलाफ स्थायी समाधान खोजें।
