करोड़ों के बजट के बावजूद दावों की खुली पोल, व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल
Junaid Khan - शहडोल। संभागीय मुख्यालय स्थित शासकीय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अभाव चरम पर पहुँच चुका है। शासन द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर हर साल पानी की तरह बहाया जा रहा करोड़ों का बजट यहाँ प्रशासनिक अनदेखी और अव्यवस्था की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। अस्पताल परिसर में गंभीर मरीजों को लाने-ले जाने के लिए व्हीलचेयर और स्ट्रेचर जैसी अति-आवश्यक प्राथमिक सुविधा तक उपलब्ध नहीं है। इसके चलते दूर-दराज़ के ग्रामीण अंचलों से उम्मीद लेकर आ रहे बेबस परिजनों को अपने बीमार स्वजनों को गोद या कंधों पर उठाकर ओपीडी और वार्डों तक ले जाना पड़ रहा है। हाल ही में सामने आए एक प्रत्यक्ष मामले ने अस्पताल प्रशासन के खोखले दावों की कलई खोलकर रख दी है। ग्राम पंचायत नौगमा के निवासी देवलाल यादव (35 वर्ष) को गंभीर अवस्था में इलाज हेतु मेडिकल कॉलेज लाया गया था। अस्पताल पहुँचने पर जब परिजनों ने व्हीलचेयर और स्ट्रेचर की तलाश की, तो घंटों मशक्कत के बाद भी कोई साधन नहीं मिला। अंततः विवश होकर परिजनों ने मरीज को अपने कंधों का सहारा दिया और सीढ़ियों व कॉरिडोर से होते हुए डॉक्टर के चैंबर तक पहुँचाया। यह दृश्य न केवल स्वास्थ्य महकमे के संवेदनहीन रवैये को उजागर करता है, बल्कि इलाज के लिए दर-दर भटकते आम आदमी की लाचारी को भी बयाँ करता है। अधिकारियों की उदासीनता और बजट का दुरुपयोग। स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों में इस घोर लापरवाही को लेकर भारी आक्रोश व्याप्त है। आम जनता का स्पष्ट कहना है कि प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने और आमजन को बेहतर चिकित्सा मुहैया कराने के उद्देश्य से विशाल बजट आवंटित करती है। मेडिकल कॉलेज जैसे उच्च स्तरीय संस्थान में सुरक्षा गार्डों, वार्ड ब्वॉय और सर्व-सुविधायुक्त उपकरणों की पूरी व्यवस्था कागजों पर दर्ज है, फिर भी ज़मीनी स्तर पर बुनियादी सुविधाओं का टोटा बना हुआ है। जिम्मेदार अधिकारियों की अनदेखी और प्रशासनिक ढिलाई के कारण स्थिति यह है कि इमरजेंसी सेवाओं में भी मरीजों को तत्काल राहत नहीं मिल पा रही है। यदि समय रहते मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है।
