हॉस्टल की बदहाली पर फूटा 'नौनिहालों' का गुस्सा,ब्यौहारी के छात्र 100 KM पैदल चलकर कलेक्टर से गुहार लगाने निकले
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में संचालित सरकारी आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों की आंतरिक बदहाली अब जन-आक्रोश का रूप धारण कर चुकी है। अपनी जायज बुनियादी सुविधाओं, घटिया भोजन, बदहाल सड़कों और अनुशासनिक अव्यवस्थाओं की निष्पक्ष मांग को लेकर अब जिले की नई पीढ़ी आर-पार के बगावती तेवर में नजर आ रही है। स्थिति यह है कि अपनी बात शासन-प्रशासन तक पहुँचाने के लिए मासूम बच्चों को सोशल मीडिया छोड़कर सीधे सड़कों का रुख करना पड़ रहा है। ताजा सनसनीखेज मामला ब्यौहारी स्थित मॉडल खंडोली विद्यालय से सामने आया है, जहाँ छात्रावास की गंभीर बदहाली और व्यवस्थापकों की उपेक्षा से आक्रोशित होकर दर्जनों छात्र स्कूल व छात्रावास परिसर से बाहर निकल पड़े। अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करने के लिए छात्रों ने ब्यौहारी से जिला मुख्यालय शहडोल तक करीब 100 किलोमीटर लंबा चुनौतीपूर्ण सफर पैदल ही तय करने का साहसिक फैसला लिया। हाथ में बिना किसी राजनीतिक झंडे या नारेबाजी के, केवल न्याय की आस लिए रीवा-शहडोल स्टेट हाईवे पर लगातार आगे बढ़ रहे इन नौनिहालों के कदमों ने जिले के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, खबर लिखे जाने तक छात्र 6 किलोमीटर से अधिक का सफर तय कर हाईवे पर बढ़ते जा रहे थे, जिससे व्यवस्था की लापरवाही उजागर हो गई है। एक दिन पहले जयसिंहनगर में छात्राओं ने फांदी थी दीवार, लगातार सामने आ रही प्रशासनिक विफलताएं। प्रशासनिक संवेदनहीनता का यह कोई पहला मामला नहीं है; बल्कि महज 24 घंटे पहले ही जयसिंहनगर स्थित शासकीय आवासीय विद्यालय की छात्राएं छात्रावास की दीवार फांदकर अपनी समस्याएं सुनाने के लिए करीब 40 किलोमीटर का जोखिमभरा सफर पैदल तय करने निकल पड़ी थीं। जिले में बार-बार दोहराई जा रही ऐसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि छात्रावास की चारदीवारी के भीतर रहने वाले इन मासूमों की शिकायतों को स्थानीय स्तर पर दबाया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो ब्यौहारी के छात्रों के इस बड़े कदम से पूर्व छात्रावास के भीतर आपसी विवाद और सुविधाओं को लेकर भारी नाराजगी व्याप्त थी। जिले के दूरदराज इलाकों से आए दिन मासूम बच्चों का सड़कों पर उतरना सीधे तौर पर जिला शिक्षा विभाग, जनजातीय कार्य विभाग (TRI) और स्थानीय छात्रावास अधीक्षकों की मॉनिटरिंग प्रणाली पर तीखे सवाल खड़े करता है। आखिर ऐसा कौन सा भारी संकट या विभागीय लापरवाही है, जिसके चलते नन्हें-मुन्ने बच्चों को अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर 100 किलोमीटर दूर कलेक्टर कार्यालय तक जाने के लिए पैदल मार्च की राह चुननी पड़ रही है? जिला शिक्षा अधिकारी अतुल चौधरी का बयान: समझाइश का प्रयास जारी, उठ रहे कई गंभीर सवाल। पूरे घटनाक्रम पर मामले की गंभीरता को देखते हुए शहडोल के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) अतुल चौधरी ने जानकारी देते हुए बताया कि "करीब आधे घंटे पहले ही बच्चों के पैदल निकलने की सूचना प्राप्त हुई है। प्राथमिक जानकारी के अनुसार बच्चे सड़क निर्माण की मांग कर रहे हैं और बीते दिन बच्चों के बीच आपस में विवाद की बात भी सामने आई है। विभागीय टीम को तुरंत सक्रिय कर दिया गया है; बच्चों को समझा-बुझाकर यात्रा रोकने और छात्रावास वापस भेजने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। उनकी जो भी प्रशासनिक या जमीनी समस्याएं हैं, उनका समयबद्ध समाधान कराया जाएगा।" बहरहाल, अधिकारियों के इन आश्वासनों के बावजूद, जनता और प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि केवल खानापूर्ति और समझाइश से बात नहीं बनेगी। अगर छात्रावास अधीक्षकों और जिम्मेदार अफसरों ने समय रहते बच्चों के बीच उपजे असंतोष और बुनियादी समस्याओं को सुलझा लिया होता, तो मासूमों को हाईवे की तपती सड़क पर उतरने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। यह पदयात्रा सिर्फ बच्चों का पैदल मार्च नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
