खाकी के साये में ब्लैकमेलिंग का बड़ा खेल?

शहडोल-अनूपपुर में सनसनी, 5 लाख वसूली के बाद फिर मांगी मोटी रकम!फर्जी केस का खौफ,आधी रात सपरिवार अपहरण और थाने में सौदेबाजी 

पुलिस महकमे और प्रशासनिक साख पर उठे तीखे सवाल 


Junaid Khan - शहडोल। अनूपपुर। सोशल मीडिया पर महिला मित्र से शुरू हुई मामूली जान-पहचान किस कदर एक सुनियोजित और खौफनाक 'हनी ट्रैप' व संगठित ब्लैकमेलिंग सिंडिकेट का रूप ले सकती है, इसका एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला शहडोल-अनूपपुर संभाग में सामने आया है। पीड़ित अनूपपुर निवासी मनोज कुमार निगम द्वारा उच्च पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र को सौंपी गई शिकायत ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है। शिकायत के अनुसार, रश्मी निगम,मनोज शुक्ला, अब्दुल कलीम, शेख रशीद और लालबहादुर जायसवाल सहित एक गिरोह ने मिलकर उन्हें संगीन आपराधिक मामले में फंसाने का खौफ दिखाया। आरोप है कि इस कथित नेटवर्क ने कानून और खाकी का खौफ दिखाकर पीड़ित से लगभग 5 लाख रुपये नकद, 9.5 ग्राम वजनी सोने की चेन और उनका मोबाइल फोन तक ऐंठ लिया। पीड़ित ने सनसनीखेज दावा किया है कि आरोपियों का दल पुलिस टीम के साथ उनके घर पहुंचा और बिना किसी वैधानिक नोटिस अथवा कागजी प्रक्रिया के पीड़ित, उनकी बेकसूर पत्नी और मासूम बच्चों को जबरन उठाकर थाने ले गया। थाने के भीतर ही परिवार को जेल भेजने और सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल करने की धमकियां देकर खुली सौदेबाजी का खेल खेला गया, जिसके बाद दबाव में आकर पीड़ित को यूपीआई और बैंक खातों के जरिए लाखों रुपये ट्रांसफर करने पर मजबूर होना पड़ा।

कानून की धज्जियां उड़ीं,क्या थाना बना निजी सौदेबाजी का अड्डा या चल रहा था समानांतर वसूली तंत्र?

इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य प्रदेश शासन की 'जीरो टॉलरेंस' नीति, पुलिस महकमे के इकबाल और कानून-व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। किसी भी नागरिक और उसके परिवार को स्थानीय थाना क्षेत्र को सूचना दिए बिना या बिना किसी विधि सम्मत दस्तावेज व एफआईआर के इस तरह उठा लेना सीधे तौर पर मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का खुला उल्लंघन है। विधि विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि कानूनन पुलिस का कार्य अपराधों की निष्पक्ष जांच करना है, न कि किसी थाने के भीतर बैठकर धन उगाही, जबरन समझौते या मध्यस्थता का कारोबार चलाना। मामले में जिस तरह से बैंक ट्रांजैक्शन के सबूत, गहनों की जब्ती और जबरन लिखे गए समझौते के आवेदन की बातें सामने आई हैं, वे इस ओर इशारा करती हैं कि कानून के रखवालों की कथित सरपरस्ती में एक बेहद शातिर गिरोह सक्रिय था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 5 लाख रुपये, सोने की चेन और मोबाइल ऐंठने तथा कथित समझौता कराने के बावजूद पुलिस के नाम पर अतिरिक्त 5 लाख रुपये की नई मांग रख दी गई, जिसने पीड़ित को पूरी तरह तोड़कर रख दिया और उन्हें न्याय के लिए उच्च अधिकारियों का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ा।

उच्चस्तरीय जांच की मांग,आरोपियों की गिरफ्तारी,रकम की बरामदगी और खाकी में छिपे 'भेड़ियों' पर कार्रवाई की कसौटी! 

अब यह पूरा मामला केवल दो पक्षों के बीच पैसे के लेनदेन का साधारण विवाद न रहकर एक बड़े संगठित ब्लैकमेलिंग सिंडिकेट और पुलिसिया साठगांठ का बड़ा राजनीतिक व प्रशासनिक मुद्दा बन चुका है। पीड़ित परिवार ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मामले की निष्पक्ष व उच्चस्तरीय जांच कराने, वसूली गई पूरी रकम, मोबाइल व सोने की चेन वापस दिलाने और अपने परिवार को जान-माल की पुख्ता सुरक्षा देने की गुहार लगाई है। जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि घटना के समय थाने में कौन-कौन से अधिकारी व कर्मचारी मौजूद थे, क्या जनरल डायरी (जीडी) में इस पूरी कार्रवाई की कोई आधिकारिक प्रविष्टि की गई थी, और किन अधिकारियों की शह पर थाने के भीतर यह असंवैधानिक लेन-देन अंजाम दिया गया। क्षेत्रीय जनमानस और स्थानीय जागरूक वर्ग की नजरें अब जिला प्रशासन व पुलिस कप्तानों पर टिकी हैं कि क्या इस कथित वसूली तंत्र में शामिल दबंगों, तथाकथित ब्लैकमेलरों और खाकी पर दाग लगाने वाले संदिग्ध पुलिसकर्मियों पर सख्त कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई होती है, या फिर यह संगीन मामला भी केवल जांच के कागजी आश्वासनों और फाइलों के पुलिंदों में दबा दिया जाएगा।

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