बिना अनुज्ञा खड़े हो रहे बहुमंजिला ढांचे,नोटिस की कागजी खानापूर्ति के बीच राजस्व निरीक्षक की चुप्पी ने बढ़ाई साख पर आंच
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों और स्थानीय निकायों में नियम-कायदे क्या केवल आम जनता को परेशान करने के लिए बनाए गए हैं या फिर कुर्सी पर बैठे आला अफसरों की मर्जी के हिसाब से कानून की परिभाषाएं बदल जाती हैं? शहडोल जिले की नगर परिषद जयसिंहनगर से सामने आया ताजा मामला तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रहा है। यहाँ वार्ड क्रमांक 01 में लगभग 15×30 फीट की बेशकीमती भूमि पर बिना किसी वैध भवन अनुज्ञा (Building Permission) के प्रथम तल का धड़ल्ले से व्यावसायिक निर्माण करा लिया गया। हद तो तब हो गई जब मामला उजागर होने पर नगर परिषद प्रशासन ने मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1961 की धाराओं का हवाला देते हुए नोटिस थमाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। नोटिस में निर्माण को दंडनीय अपराध बताते हुए ऑनलाइन अनुज्ञा लेने के निर्देश तो जारी किए गए, लेकिन धरातल पर काम रुकवाने या अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का साहस निकाय के जिम्मेदार अधिकारी नहीं जुटा सके। स्थानीय गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि जैसे ही मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) का तबादला या बदलाव होता है, वैसे ही निर्माण कार्यों की 'वैधता' और 'अवैधता' का पैमाना भी रातों-रात बदल जाता है। पूर्व के अधिकारियों के कार्यकाल में जिन अनियमितताओं पर पर्दा पड़ा रहा, क्या नए प्रशासनिक फेरबदल के बाद उन पर निष्पक्ष जांच का चाबुक चलेगा या फिर यह पूरी कसरत केवल सौदेबाजी और कागजी औपचारिकताओं तक सीमित रह जाएगी? इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य प्रदेश शासन की जीरो टॉलरेंस नीति और सुशासन के दावों की हवा निकाल कर रख दी है। एक तरफ राज्य की मोहन यादव सरकार यह ढोल पीटती है कि आम नागरिकों को भवन निर्माण अनुमति, नामांतरण और नक्शा पास कराने के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी व ऑनलाइन बनाया जाए, वहीं दूसरी तरफ जयसिंहनगर नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी सरकार की मंशा पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सवाल यह उठता है कि एक आम गरीब या मध्यमवर्गीय नागरिक जब अपने आशियाने के लिए एक ईंट भी रखता है, तो निकाय का अमला अमले-जुमले के साथ बुलडोजर का डर दिखाने पहुंच जाता है, लेकिन उसी निकाय की नाक के नीचे 15×30 फीट के व्यावसायिक निर्माण पर पूरी प्रशासनिक मशीनरी आंखें मूंदकर क्यों बैठी रही? क्या सरकारी नियमों की सख्ती केवल लाचार नागरिकों की जेब ढीली कराने का जरिया बनकर रह गई है? जब इस संवेदनशील और गंभीर मामले पर ग्राउंड जीरो का सच जानने के लिए नगर परिषद में पदस्थ राजस्व निरीक्षक सुनीता बैगा से दूरभाष के माध्यम से संपर्क साधने का प्रयास किया गया, तो मैडम ने फोन कॉल रिसीव करना तक मुनासिब नहीं समझा। जिम्मेदार अधिकारियों का जनता और मीडिया के सवालों से इस तरह भागना और रहस्यमयी चुप्पी साधना अपने आप में कई गहरे संदेहों और अंदरूनी सांठगांठ को जन्म दे रहा है। अखबार की इस विशेष पड़ताल के बाद अब सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन, संभागायुक्त और नगरीय प्रशासन विभाग के समक्ष खड़ा है। क्या जयसिंहनगर नगर परिषद की कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाएगी? क्या नोटिसों के खेल से इतर इस अवैध व्यावसायिक निर्माण पर नगर पालिका अधिनियम के तहत कड़ी वास्तविक कार्रवाई होगी या फिर हमेशा की तरह फाइलें ठंडे बस्ते में दबा दी जाएंगी? अगर मुख्य नगर पालिका अधिकारी के बदलते ही नियम और नीतियां बदलने का यह खतरनाक खेल यूं ही चलता रहा, तो निकाय व्यवस्था से आम जनता का विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। जनता अब कागजी नोटिसों का ड्रामा नहीं, बल्कि धरातल पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई देखना चाहती है ताकि यह साबित हो सके कि मध्य प्रदेश में कानून का राज किसी अधिकारी या रसूखदार के इशारे पर नहीं, बल्कि संविधान और तय नियमों के हिसाब से चलता है।
