बांधवगढ़-अचानकमार टाइगर कॉरिडोर में 40 बाघों और हजारों हेक्टेयर सघन वन पर मंडराया खतरा, NGT के नोटिस के बावजूद पेड़ों की कटाई जारी,ग्रामीणों ने ‘टाइगर सफारी’ और ‘ग्रीन ज़ोन’ बनाने की उठाई मांग
Junaid Khan - शहडोल। संभाग का घुनघुटी वन क्षेत्र इस समय इतिहास के सबसे बड़े पर्यावरण और प्राकृतिक संकट के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। कॉर्पोरेट कंपनियों और वन विभाग की प्रशासनिक मिलीभगत से रचा जा रहा यह विध्वंस न केवल 40 से अधिक बाघों, तेंदुओं और 22 प्रकार के अनुसूची-1 (Schedule-1) संरक्षित वन्यजीवों के अस्तित्व को खत्म करने पर आमादा है, बल्कि पूरे शहडोल संभाग को 50 डिग्री सेल्सियस की खौफनाक गर्मी और जानलेवा जल-संकट में धकेलने की पूरी तैयारी कर चुका है। संभाग कमिश्नर कार्यालय के आवक लिपिक शाखा (पंजीयन तिथि 06 नवंबर 2026) में भारत के माननीय प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर घुनघुटी बचाओ अभियान समिति, RTI व पर्यावरण कार्यकर्ताओं और संभाग के आम नागरिकों ने 16 प्रस्तावित कोयला खदानों (3 स्वीकृत, 4 अनुशंसित और अन्य) की पर्यावरण स्वीकृतियां (EC) तत्काल रद्द करने तथा पूरे घुनघुटी जंगल को अविलंब 'ग्रीन ज़ोन' और 'इनवायलेट ज़ोन' घोषित करने की पुरजोर मांग की है।
2019 में जिस जंगल को बताया था 'टाइगर टेरिटरी', आज वही निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी
ज्ञापन में प्रस्तुत दस्तावेज और साक्ष्य वन विभाग के दोहरे चरित्र और शासन-प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। वर्ष 2019 में जब एसईसीएल (SECL) ने मात्र 250 हेक्टेयर की एक छोटी खदान की अनुमति मांगी थी, तब वन विभाग ने ही लिखित रूप से इसे अत्यंत संवेदनशील 'टाइगर टेरिटरी' करार देकर मानव-वन्यजीव संघर्ष की सख्त चेतावनी दी थी और खदान निरस्त कर इसे 'इनवायलेट ज़ोन' घोषित किया था। परंतु आज वही विभाग निजी उद्योगपतियों और सीमेंट कंपनियों के आगे नतमस्तक नजर आ रहा है। मारवाटोला-6, मारवाटोला-7 (जिसमें रामा सीमेंट को अकेले 10,000 हेक्टेयर वन भूमि सौंपने का षड्यंत्र है), जेके सीमेंट, गंगा खनिज और बजरंग इस्पात (पथौरा ईस्ट/वेस्ट, गोयल टीएमटी) जैसी 16 खदानों को चुपके से प्रशासनिक हरी झंडी दी जा रही है। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980 और आदिवासियों को संवैधानिक अधिकार देने वाले पेसा (PESA) कानून की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
प्रधानमंत्री की NBWL संस्था की अनदेखी, NGT में अपील फिर भी जमीनी स्तर पर बेखौफ कटाई
भारतीय भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से प्रमाणित करती है कि घुनघुटी, बांधवगढ़ और अचानकमार को जोड़ने वाला एक प्रमुख 'टाइगर कॉरिडोर' है, जहां बाघों के स्वच्छंद विचरण के वायरल वीडियो आए दिन सामने आते रहते हैं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले 'राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड' (NBWL) से बिना अनिवार्य अनुमति लिए इस विनाशकारी योजना को आगे बढ़ाया गया। RTI एवं वन्यजीव कार्यकर्ता गजेंद्र सिंह परिहार द्वारा दायर याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT - Appeal No. 18 of 2026), सेंट्रल एम्पावरमेंट कमेटी (CEC) दिल्ली और पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) में शिकायत दर्ज होने व नोटिस जारी होने के बाद भी प्रशासनिक शह पर जंगलों की कटाई बदस्तूर जारी है। एक तरफ जहां उमरिया और पाली क्षेत्र में जल-जंगल तथा ग्राम सभा के अधिकारों की रक्षा कर रहे 20 से अधिक आदिवासियों पर झूठे मुकदमे दर्ज कर उनका प्रशासनिक दमन किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जनता ने स्पष्ट विकल्प दिया है कि यदि सरकार को राजस्व और रोजगार ही चाहिए तो 35,000 हेक्टेयर वाले माधव टाइगर रिजर्व की तर्ज पर घुनघुटी को 'टाइगर रिजर्व' घोषित कर 'टाइगर सफारी' (इको-टूरिज्म) विकसित की जाए। इससे हर साल सैकड़ों करोड़ का राजस्व भी मिलेगा और शहडोल, कल्याणपुर, शाहपुर व सुहागपुर की जनता को खदानों के बारूद और बाघ-तेंदुओं के खौफ से मुक्ति भी मिलेगी।

