शहडोल रेलवे स्टेशन पर अव्यवस्था का जाल

अवैध ठेले, नशे की शिकायतें, ऑटो चालकों की मनमानी और जिम्मेदारों की चुप्पी

उच्च स्तरीय जांच की उठी मांग 


Junaid khan - शहडोल। मध्यप्रदेश के शहडोल रेलवे स्टेशन की व्यवस्था इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। स्टेशन परिसर में अवैध ठेलों का संचालन, कथित नशे की बिक्री की शिकायतें, ऑटो चालकों की मनमानी, लाइसेंस व्यवस्था पर सवाल और सुरक्षा एजेंसियों की निष्क्रियता को लेकर यात्रियों, स्थानीय नागरिकों और वैध कैंटीन संचालकों में भारी असंतोष पनप रहा है। मामला अब सिर्फ अवैध दुकानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रेलवे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।

प्लेटफॉर्म से मुख्य द्वार तक फैला अवैध कारोबार?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार, प्लेटफॉर्म किनारे और बीच रास्तों में बिना स्पष्ट अनुमति के चाय-पान, सिगरेट और नाश्ते के ठेले दिन-रात संचालित हो रहे हैं। इन ठेलों के आसपास आए दिन झगड़े और गाली-गलौज की घटनाएं सामने आती हैं। कई बार नशे की हालत में विवाद होने की बात भी कही जा रही है। यात्रियों का कहना है कि परिवार के साथ सफर करने वाले लोगों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है।

सेटिंग की चर्चा और सुरक्षा पर सवाल 

कुछ वायरल वीडियो में कथित तौर पर युवकों द्वारा “सेटिंग” होने की बात कही जाती सुनाई दे रही है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे जनमानस में शंका जरूर गहरी हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि अवैध गतिविधियां नहीं हो रहीं, तो खुलेआम ऐसी बातें क्यों कही जा रही हैं? स्टेशन की सुरक्षा की जिम्मेदारी रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और Government Railway Police (GRP) के पास है। ऐसे में निगरानी और कार्रवाई की स्थिति क्या है, यह स्पष्ट होना जरूरी है। 

अंदर की कैंटीनें संकट में

स्टेशन परिसर के अंदर वैध रूप से संचालित कैंटीन संचालकों ने भी खुलकर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि वे रेलवे प्रशासन को भारी मासिक किराया देते हैं, बिजली-पानी और अन्य खर्च अलग से वहन करते हैं। कई संचालक ठेकेदार से पेटी कॉन्ट्रैक्ट लेकर व्यवसाय करते हैं।

उनका आरोप है कि बाहर बिना अनुमति लगे ठेलों की वजह से उनका पूरा कारोबार प्रभावित हो रहा है। “यदि बाहर ही सब कुछ बिकेगा तो अंदर की कैंटीनें कैसे चलेंगी?”यह सवाल अब खुलकर उठने लगा है। कुछ संचालकों ने किराया कम करने या अवैध ठेले हटाने की मांग की है।

ऑटो चालकों की मनमानी से बढ़ी परेशानी 

स्टेशन के बाहर निर्धारित पार्किंग होने के बावजूद ऑटो चालकों द्वारा बीच सड़क पर वाहन खड़ा कर सवारी भरने की शिकायतें आम हैं। कई बार ऑटो स्टेशन परिसर के अंदर तक घुस जाते हैं, जो नियमों के विरुद्ध बताया जाता है। पीछे के गेट और प्लेटफॉर्म नंबर तीन के आसपास रात में संदिग्ध गतिविधियों की चर्चा भी स्थानीय स्तर पर हो रही है। यदि यह सही है, तो यह सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर विषय है।

लाइसेंस और वेंडर व्यवस्था पर प्रश्न 

सूत्रों का कहना है कि कुछ वेंडरों के पास सीमित ट्रेनों में सेवा देने का लाइसेंस है, लेकिन वे कई अन्य ट्रेनों में भी खाद्य सामग्री चढ़ा रहे हैं। वर्षों से गुणवत्ता जांच और लाइसेंस सत्यापन की नियमित कार्रवाई न होने की शिकायतें भी सामने आई हैं।

यदि सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और लाइसेंस रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच हो, तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

शिकायतें उच्च अधिकारियों तक 

स्थानीय नागरिकों ने मंडल रेल प्रबंधक (DRM), महाप्रबंधक (GM) और रेल मंत्रालय तक शिकायतें भेजने की बात कही है। सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट साझा किए गए हैं। जवाब में शिकायत दर्ज होने का संदेश तो मिलता है, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यापक कार्रवाई की प्रतीक्षा बनी हुई है।

थाना प्रभारी की भूमिका पर चर्चा 

इन सभी आरोपों के बीच स्टेशन थाना प्रभारी विनोद कुमार तिवारी का नाम भी चर्चा में है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि यदि स्टेशन परिसर में अव्यवस्था और कथित अवैध गतिविधियां लंबे समय से चल रही हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

कुछ लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर सख्ती दिखाई जाए तो स्थिति एक दिन में नियंत्रित हो सकती है। वहीं, निष्पक्ष जांच की मांग भी जोर पकड़ रही है, ताकि आरोप-प्रत्यारोप से परे सच्चाई सामने आ सके।

सीसीटीवी फुटेज बनेगी आधार?

स्टेशन परिसर में अनेक सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। नागरिकों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों की फुटेज की स्वतंत्र जांच कराई जाए। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या अवैध ठेले बिना अनुमति संचालित हो रहे हैं?

क्या ऑटो चालक नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं?

क्या लाइसेंसधारी वेंडर निर्धारित दायरे से बाहर काम कर रहे हैं?

पारदर्शिता के लिए यह जांच आवश्यक मानी जा रही है। बढ़ता आक्रोश और आंदोलन की चेतावनी। यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो स्थानीय नागरिक, यात्री और व्यापारी संयुक्त रूप से धरना-प्रदर्शन करने की चेतावनी दे रहे हैं। उनका कहना है कि यह मामला अब सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ गया है।

क्या हो आगे की राह? 

विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान के लिए तीन कदम जरूरी हैं—अवैध गतिविधियों की स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच।

लाइसेंस, पार्किंग और वेंडर व्यवस्था का पारदर्शी पुनर्गठन।

जिम्मेदार अधिकारियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करना। निष्कर्ष

शहडोल रेलवे स्टेशन क्षेत्र की यह स्थिति प्रशासन के लिए एक गंभीर परीक्षा है। यदि आरोप निराधार हैं तो पारदर्शी जांच से विश्वास बहाल किया जा सकता है। और यदि कहीं अनियमितता है, तो सख्त कार्रवाई से ही व्यवस्था सुधर सकती है। अब नजरें रेलवे प्रशासन और उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। क्या वे निर्णायक कदम उठाएंगे या स्टेशन की अव्यवस्था यूं ही चर्चा का विषय बनी रहेगी?

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