प्रशासनिक ढर्रे ने 'अनुगूंज' को बनाया 'मौन', सीएम हेल्पलाइन की साख पर भी विभाग ने फेरा पानी

डेढ़ साल बाद भी मेंटर्स के मानदेय का अता-पता नहीं; जेडी ऑफिस में दी सांस्कृतिक सत्याग्रह की चेतावनी 


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'सीएम हेल्पलाइन' जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण का दावा करती है, लेकिन शहडोल संभाग में लोक शिक्षण विभाग ने इस व्यवस्था को मजाक बनाकर रख दिया है। अनुगूंज कार्यक्रम 2024-25 के तहत शासकीय विद्यालयों के बच्चों को तराशने वाले मेंटर्स आज अपने ही हक के पैसे के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। विडंबना देखिए कि विभाग के जिम्मेदार अधिकारी न केवल भुगतान रोके बैठे हैं, बल्कि सीएम हेल्पलाइन पर की गई शिकायतों को भी 'आंशिक निराकरण' या 'निरस्त' दिखाकर सरकार की आंखों में धूल झोंक रहे हैं।

झूठे आश्वासनों की भेंट चढ़ा कलाकारों का पसीना 

गौरतलब है कि अनुगूंज कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञों ने शासकीय स्कूलों के बच्चों को 15-15 दिनों का कठिन प्रशिक्षण दिया था। इन बच्चों ने 10 जनवरी 2025 को स्थानीय मानस भवन ऑडिटोरियम में अपनी कला का शानदार प्रदर्शन जिले के आला अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने किया था। उस वक्त मंच से खूब तालियां बजीं और बड़े-बड़े वादे हुए, लेकिन कार्यक्रम के डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी इन मेंटर्स को फूटी कौड़ी नसीब नहीं हुई है। कलाकार और मेंटर्स पहले भी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और संयुक्त संचालक (JD) कार्यालय के चक्कर काट चुके हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।

सीएम हेल्पलाइन: समाधान नहीं,सरकारी 'लीपापोती' का केंद्र

मेंटर्स ने संयुक्त संचालक उमेश कुमार धुर्वे से मुलाकात कर विभाग की बड़ी कालाबाजारी का पर्दाफाश किया है। मेंटर्स का आरोप है कि उन्होंने जब अपनी जायज मांग को लेकर सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई, तो विभाग ने बिना भुगतान किए ही उसे 'आंशिक रूप से बंद' करा दिया या पोर्टल पर 'निराकरण हो गया' का गलत स्टेटस अपडेट कर दिया। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक धोखाधड़ी का मामला है, जहाँ अपनी साख बचाने के लिए विभाग द्वारा मुख्यमंत्री की प्राथमिकता वाली योजना को ही गुमराह किया जा रहा है। सांस्कृतिक विरोध की तैयारी: जेडी कार्यालय बनेगा मंच लगातार हो रही उपेक्षा से आक्रोशित मेंटर्स ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। संयुक्त संचालक को सौंपे गए पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि एक सप्ताह के भीतर लंबित भुगतान नहीं किया गया, तो सभी मेंटर जेडी कार्यालय के समक्ष 'सांस्कृतिक तरीके' से विरोध प्रदर्शन करेंगे। कलाकारों का कहना है कि जिस कला को उन्होंने बच्चों को सिखाया,अब उसी कला का उपयोग वे गूंगे-बहरे प्रशासन को जगाने के लिए करेंगे। तबादलों और रिटायरमेंट की आड़ में छिपाई जा रही नाकामी। संयुक्त संचालक लोक शिक्षण, उमेश कुमार धुर्वे ने मेंटर्स की शिकायतों को गंभीरता से सुनते हुए स्वीकार किया कि भुगतान में देरी हुई है। हालांकि, उन्होंने इसके पीछे विभागीय अधिकारियों के स्थानांतरण और सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) का तर्क दिया है। श्री धुर्वे ने मेंटर्स को सांत्वना देते हुए त्वरित भुगतान का भरोसा तो दिलाया है, लेकिन सवाल वही है कि क्या ये आश्वासन भी पिछले डेढ़ साल की तरह खोखले साबित होंगे?

जनता की अदालत में जवाबदेह कौन?

एक तरफ सरकार शिक्षा और कला को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों का बजट आवंटित करती है, वहीं दूसरी ओर शहडोल संभाग के अधिकारी इस बजट की बंदरबांट या लेटलतीफी में माहिर हो चुके हैं। मेंटर्स का मानदेय रोकना केवल एक वित्तीय मामला नहीं है, बल्कि यह उन कलाकारों के आत्मसम्मान पर चोट है जिन्होंने जिले का मान बढ़ाया था। अब देखना यह है कि प्रशासन सात दिनों की डेडलाइन पर जागता है या फिर संभाग को एक अनोखे 'सांस्कृतिक विरोध' का गवाह बनना पड़ेगा।

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