प्रशासन की चेतावनी या औपचारिकता? शराब दुकानों पर 'QR कोड' का घेरा, मनमानी वसूली पर चलेगा हंटर
Junaid Khan - शहडोल। जिले में शराब के सिंडिकेट द्वारा ग्राहकों की जेब पर डाले जा रहे डाके को रोकने के लिए आखिरकार आबकारी विभाग को अपनी नींद तोड़नी पड़ी है। लंबे समय से चल रहे ओवररेटिंग के खेल और नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले शराब ठेकेदारों के खिलाफ अब तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। शासन के कड़े निर्देश के बाद अब हर दुकान पर 'QR कोड' लगाना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसे स्कैन करते ही मोबाइल पर सरकारी रेट लिस्ट नुमाया हो जाएगी। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था केवल कागजों तक सिमटेगी या वाकई में 'बोतल' के पीछे छिपे काले खेल पर लगाम लगेगी?
स्मार्टफोन बनेगा हथियार, उपभोक्ता खुद करेंगे मिलान
विभागीय सुस्ती के कारण अब तक शराब दुकानों पर रेट लिस्ट का अता-पता नहीं रहता था, जिसका फायदा उठाकर सेल्समैन ग्राहकों से मनमाने दाम वसूलते रहे हैं। अब नई व्यवस्था के तहत ई-आबकारी पोर्टल से जनरेटेड क्यूआर कोड दुकानों पर चस्पा करना होगा। कोई भी उपभोक्ता अपने स्मार्टफोन से इसे स्कैन कर जिले की आधिकारिक रेट लिस्ट देख सकेगा। यह सीधे तौर पर उन ठेकेदारों को चुनौती है जो एमआरपी (MRP) से ज्यादा और एमएसपी (MSP) से कम पर शराब बेचकर राजस्व और उपभोक्ता, दोनों को चूना लगा रहे थे।
लाइसेंस निरस्तीकरण की लटकी तलवार
आबकारी विभाग ने इस बार कड़े तेवर दिखाते हुए साफ कर दिया है कि पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं होगा। यदि किसी दुकान संचालक ने निर्धारित मूल्य से इधर-उधर बिक्री की, तो उसे केवल जुर्माना भरकर मुक्ति नहीं मिलेगी, बल्कि सीधे लाइसेंस निरस्तीकरण जैसी बड़ी वैधानिक कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। यह उन रसूखदारों के लिए सीधी चेतावनी है जो प्रशासन को अपनी जेब में रखने का गुमान पालते हैं।
जांच अभियान की समय सीमा तय, 11 मई तक रिपोर्ट तलब
इस व्यवस्था को केवल निर्देश तक सीमित न रखते हुए, विभाग ने 28 अप्रैल से 7 मई तक एक विशेष जांच अभियान छेड़ा है। इस दौरान जिले की हर एक दुकान की सूक्ष्मता से जांच की जाएगी। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि 11 मई तक हर हाल में जांच रिपोर्ट मुख्यालय में जमा करनी होगी। प्रशासन का यह कदम यह जांचने के लिए है कि आखिर कितने ठेकेदारों ने शासन के आदेश को गंभीरता से लिया है और कितने अब भी ठेंगा दिखा रहे हैं।
पिछली विफलता से सबक लेने की जरूरत
गौरतलब है कि जिले में यह प्रयोग पिछले साल भी शुरू किया गया था, लेकिन वह महज कुछ महीनों की 'नौटंकी' बनकर रह गया। नए ठेके होने के बाद तो यह व्यवस्था पूरी तरह से गायब हो गई थी। ऐसा लगता था जैसे प्रशासन ने ठेकेदारों को लूट की खुली छूट दे दी हो। अब जब शासन ने इसे दोबारा अनिवार्य किया है, तो जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस बार यह नियम टिकाऊ साबित होगा या फिर 'साहबों' की मिलीभगत इसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल देगी।
भ्रष्टाचार के 'सिंडिकेट' पर कड़ा प्रहार
शराब दुकानों पर होने वाली अवैध वसूली केवल एक दुकानदार का निजी मामला नहीं, बल्कि एक संगठित सिंडिकेट की ओर इशारा करती है। इस क्यूआर कोड व्यवस्था से उस जवाबदेही को तय करने की कोशिश की जा रही है जो अब तक नदारद थी। जिला आबकारी अधिकारी सावित्री भगत के अनुसार, कई दुकानों में यह व्यवस्था लागू हो चुकी है और शेष में जल्द शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन का दावा है कि इस कदम से उपभोक्ता सशक्त होगा और बिचौलियों का खेल खत्म होगा।
क्या सुधरेगा जमीनी स्तर पर सिस्टम?
कागजी आदेश निकालना आसान है, लेकिन शहडोल जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले के ग्रामीण अंचलों में इसे लागू करना असली चुनौती है। क्या वहां का आम आदमी स्मार्टफोन निकालकर क्यूआर कोड स्कैन करने का साहस जुटा पाएगा? और अगर वह शिकायत करता है, तो क्या उसे माफिया के रसूख से सुरक्षा मिलेगी? प्रशासन को केवल क्यूआर कोड चस्पा करने तक नहीं रुकना चाहिए, बल्कि एक सशक्त हेल्पलाइन नंबर भी जारी करना चाहिए ताकि मौके पर ही कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
प्रशासनिक साख दांव पर
फिलहाल, 7 मई तक चलने वाला यह विशेष अभियान प्रशासन के लिए एक 'लिटमस टेस्ट' की तरह है। अगर कार्रवाई में निष्पक्षता नहीं दिखी, तो जनता का भरोसा सिस्टम से पूरी तरह उठ जाएगा। अब गेंद आबकारी विभाग के पाले में है। वे नियमों का पालन करवाते हैं या फिर पुरानी रवायत की तरह ठेकेदारों के दबाव में घुटने टेक देते हैं, यह आने वाले कुछ दिन साफ कर देंगे।
