अकेलेपन का फायदा उठाकर शातिर ठगों ने उड़ा दी दिवंगत पति की जीवनभर की कमाई, 'गिफ्ट और कस्टम' के नाम पर दो महीने तक चलता रहा वसूली का खेल, अब लकीर पीट रही पुलिस
Junaid Khan - शहडोल। डिजिटलाइजेशन और आधुनिकता के इस दौर में वैवाहिक वेबसाइट्स (Matrimonial Sites) संस्कारी जीवनसाथी तलाशने का जरिया कम, अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय शातिर ठगों का 'हंटिंग ग्राउंड' (शिकारगाह) अधिक बनती जा रही हैं। ताजातरीन और रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला शहडोल संभाग से सामने आया है, जहां एक सरकारी स्कूल की विधवा शिक्षिका को अपने अकेलेपन की कीमत 34 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि गंवाकर चुकानी पड़ी है। अपने पति के आकस्मिक निधन के बाद एकाकीपन से जूझ रही इस शिक्षिका ने जब वैवाहिक पोर्टल पर भरोसा किया, तो उसे क्या पता था कि परदे के पीछे बैठा कोई शातिर भेड़िया उसकी जिंदगी भर की पूंजी निगलने के लिए जाल बिछाए बैठा है। ठग ने खुद को 'लंदन का हाई-प्रोफाइल डॉक्टर संजय प्रसाद सिंह' बताकर पहले तो महिला का भावनात्मक विश्वास जीता और फिर 'गिफ्ट, कस्टम क्लीयरेंस शुल्क और कानूनी पचड़ों' का ऐसा फर्जी ताना-बाना बुना कि पीड़िता अपनी सुध-बुध खोकर दो महीने के भीतर किश्तों में करीब 34 लाख रुपये गंवा बैठी। यह राशि कोई मामूली बचत नहीं, बल्कि शिक्षिका के दिवंगत पति की मृत्यु के बाद शासकीय सेवा से मिली वह गाढ़ी कमाई थी, जो बुढ़ापे और बच्चों के भविष्य का एकमात्र सहारा थी। यह सनसनीखेज वारदात सीधे तौर पर शहडोल पुलिस और स्थानीय साइबर सेल की मुस्तैदी और उनकी खुफिया कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा तमाचा है। सवाल यह उठता है कि जब दो महीनों तक पीड़िता के बैंक खातों से अलग-अलग अज्ञात खातों में लाखों रुपये ट्रांसफर हो रहे थे, तब बैंकों के एंटी-फ्रॉड अलर्ट और पुलिस का तथाकथित 'हाई-टेक' साइबर सर्विलांस सिस्टम किस गहरी नींद में सोया हुआ था? ठगों ने न केवल महिला का मोबाइल नंबर हासिल किया, बल्कि उसके सीधेपन का फायदा उठाकर एटीएम कार्ड से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां भी उड़ा लीं। चौंकाने वाली बात यह है कि पीड़िता सामान्यतः ऑनलाइन लेनदेन भी नहीं करती थी, फिर भी ठगों ने उसके खाते को पूरी तरह खाली कर दिया। जब बार-बार पैसों की मांग से शिक्षिका का माथा ठनका और उसने बैंक स्टेटमेंट खंगाला, तब तक उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक चुकी थी। ठगी का अहसास होते ही आनन-फानन में पुलिस और साइबर सेल को लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है, लेकिन हमेशा की तरह अब वारदात हो जाने के बाद प्रशासनिक अमला केवल तकनीकी साक्ष्यों और मोबाइल नंबरों की कड़ियों को जोड़ने की कागजी कसरत में जुटा है। इस हाई-प्रोफाइल मामले ने क्षेत्र के जागरूक नागरिकों और सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। सीएसपी राजेंद्र मोहन दुबे ने शुरुआती जांच के बाद ₹34 लाख की इस म्यूट और डिजिटल डकैती की पुष्टि तो कर दी है और आरोपियों की धरपकड़ के लिए विशेष टीमों के गठन का दावा भी ठोका जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये अंतरराष्ट्रीय साइबर ठग पुलिस की पारंपरिक जांच से कोसों आगे चल रहे हैं। ऐसे में यह खबर उन तमाम गिरोहों को खुली चुनौती है जो शहडोल जैसे आदिवासी बाहुल्य और सीधे-साधे संभाग को अपनी ठगी का केंद्र बना रहे हैं। पुलिस अब जनता से इंटरनेट मीडिया और वैवाहिक साइटों पर आंख बंदकर भरोसा न करने तथा किसी भी कथित विदेशी डॉक्टर या मित्र को 'गिफ्ट या कस्टम फीस' के नाम पर पैसे न भेजने की रस्मी और खोखली अपीलें कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही है। बड़ा सवाल बरकरार है— आखिर कब तक आम जनता इन डिजिटल लुटेरों का शिकार होती रहेगी और कब हमारा पुलिस प्रशासन इन अपराधियों के गिरेबान तक पहुंचने वाला एक ठोस, आक्रामक और त्वरित रिस्पांस तंत्र विकसित कर पाएगा?
प्रशासन से तीखे सवाल
सवाल नंबर 1: दो महीने तक लगातार लाखों रुपयों का संदिग्ध ट्रांजैक्शन होता रहा, साइबर सेल का इनपुट मैकेनिज्म फेल क्यों रहा?
सवाल नंबर 2: वैवाहिक साइटों पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर भारतीय नागरिकों को शिकार बनाने वाले इन 'विदेशी डॉक्टरों' के रैकेट को ध्वस्त करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों से समन्वय क्यों नहीं किया जाता?
सवाल नंबर 3: बैंक खातों और मोबाइल नंबरों के आधार पर तत्काल 'अकाउंट फ्रीज' करने की व्यवस्था इतनी सुस्त क्यों है कि अपराधी पैसे निकालकर रफूचक्कर हो जाते हैं?
