महामहिम राज्यपाल और मुख्यमंत्री के 'सुशासन' को ठेंगा

जयसिंहनगर में कोर्ट के बेदखली आदेश की धज्जियां उड़ाकर सरकारी जमीन पर 'भू-माफिया' का नंगा नाच

कलेक्टर और कमिश्नर की साख दांव पर,तहसीलदार के आदेश को पटवारी ने डाला ठंडे बस्ते में, नगर परिषद की पाइपलाइन तोड़ी, कुंभकर्णी नींद में सोया अमला


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश में जहां एक तरफ मुख्यमंत्री और प्रदेश का शीर्ष नेतृत्व भू-माफियाओं के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति का ढिंढोरा पीट रहा है, वहीं शहडोल संभाग के जयसिंहनगर में जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। यहां रसूखदारों और भू-माफियाओं के हौसले इस कदर बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें न तो कानून का खौफ है और न ही राजस्व न्यायालय के आदेशों का डर। स्थानीय वार्ड क्रमांक-15 से प्रशासनिक साख को पूरी तरह मटियामेट करने वाला एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने समूचे जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यहां तहसीलदार के स्पष्ट और कड़े बेदखली आदेश के बावजूद शासकीय भूमि पर न केवल धड़ल्ले से पक्का निर्माण किया जा रहा है, बल्कि सरकारी संपत्ति को भी मटियामेट कर दिया गया है।

राजस्व कोर्ट का आदेश बौना,सफेदपोश' रसूख के आगे नतमस्तक तंत्र 

पूरा मामला जयसिंहनगर के वार्ड-15 स्थित खसरा क्रमांक 2006/1/1 की लगभग 0.012 हेक्टेयर बेशकीमती शासकीय भूमि से जुड़ा है। इस करोड़ों की सरकारी जमीन पर देवेंद्र पांडे (पिता अयोध्या प्रसाद पांडे) एवं अतुल पांडे (पिता बाल गोविंद पांडे) द्वारा खुलेआम पक्का निर्माण कर दुकान तानने का दुस्साहस किया जा रहा है। जन-शिकायतों और प्रारंभिक जांच के बाद पटवारी के प्रतिवेदन पर तहसीलदार जयसिंहनगर ने बकायदा राजस्व प्रकरण क्रमांक 0051/अ-68/2025-26 के तहत बेदखली का कड़ा आदेश पारित किया था। नियमानुसार इस आदेश के तुरंत बाद अतिक्रमण को मलबे में तब्दील कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन रसूख और रुपयों की खनक के आगे पूरा तंत्र नतमस्तक नजर आ रहा है।

हल्का पटवारी की 'रहस्यमयी खामोशी',आखिर किसका संरक्षण?

इस पूरे सुनियोजित खेल में हल्का पटवारी मेला राम की भूमिका घोर लापरवाही और संदेहास्पद संरक्षण की ओर साफ इशारा कर रही है। आरोप है कि पटवारी ने तहसीलदार के उस सख्त आदेश को फाइलों के अंबार में दबाकर रख दिया, जिसे तुरंत तामील कराया जाना था। पटवारी की इसी 'रहस्यमयी खामोशी' और मौन सहमति का फायदा उठाकर अतिक्रमणकारियों ने रात-दिन एक करके निर्माण कार्य को और तेज कर दिया। यह सीधे तौर पर न सिर्फ तहसीलदार कोर्ट की अवमानना है, बल्कि शासकीय सेवाशर्तों की धज्जियां उड़ाने जैसा है। क्षेत्र में चर्चा है कि पटवारी की 'मेहरबानी' के बिना इतना बड़ा दुस्साहस संभव ही नहीं है।

सिंघम एसडीएम की मेहनत पर फिरा पानी, जाते ही भू-माफिया ने पसारे पैर

यह कोई पहला मौका नहीं है जब इस बेशकीमती जमीन पर गिद्ध दृष्टि डाली गई हो। इसके पूर्व तत्कालीन निवर्तमान जांबाज एसडीएम रमेश मिश्रा ने भू-माफियाओं के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए खुद मौके पर खड़े होकर इस शासकीय भूमि से अवैध कब्जा हटवाया था। आम जनता की सहूलियत के लिए वहां सड़क का निर्माण भी कराया गया था ताकि सरकारी जमीन सुरक्षित रहे। लेकिन जैसे ही इस सिंघम अफसर का स्थानांतरण हुआ, वैसे ही प्रशासनिक ढिलाई का फायदा उठाकर भू-माफिया ने दोबारा अपने पैर पसार लिए। नए अधिकारियों के आते ही माफियाओं ने प्रशासन को खुली चुनौती दे डाली।

जेसीबी से तोड़ी मुख्य वाटर सप्लाई लाइन, जनता के हलक सुखाने की तैयारी

अतिक्रमणकारियों की गुंडई और रसूख का आलम यह है कि दुकान की नींव खोदने के चक्कर में उन्होंने नगर परिषद की मुख्य पानी सप्लाई पाइपलाइन को भी जेसीबी से बेरहमी से क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके चलते पूरे वार्ड में भारी पेयजल संकट गहराने की आशंका पैदा हो गई है। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के इस कृत्य पर नगर परिषद के जल प्रभारी दीपक चतुर्वेदी ने स्वीकार किया कि इस घोर लापरवाही पर अतिक्रमणकर्ताओं को नोटिस जारी किया गया है और आगे की विधिक कार्रवाई की जा रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल 'कागजी नोटिस' से टूटी हुई पाइपलाइन जुड़ जाएगी या भू-माफिया पर कोई ठोस कानूनी शिकंजा कसा जाएगा?

कमिश्नर और कलेक्टर की बड़ी-बड़ी कार्रवाइयों को जयसिंहनगर के मातहतों ने ठेंगा दिखाया 

शहडोल संभाग में कमिश्नर सुरभी गुप्ता और जिला कलेक्टर केदार सिंह लगातार कड़े एक्शन और औचक निरीक्षणों के जरिए सुशासन का दावा कर रहे हैं। संभाग के मुखिया जब मंचों से भू-माफियाओं को नेस्तनाबूद करने की चेतावनी देते हैं, ठीक उसी समय उनके नाक के नीचे जयसिंहनगर के तहसीलदार से लेकर एसडीएम और पटवारी पूरे अभियान की हवा निकाल रहे हैं। पूर्व में मीडिया के माध्यम से इस गंभीर मुद्दे को प्रमुखता से उठाकर शासन-प्रशासन को जगाने का प्रयास किया गया था, लेकिन जिम्मेदार अफसर 'कुंभकर्णी नींद' से जागने को तैयार नहीं हैं। वरिष्ठ अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा यह खेल कमिश्नर और कलेक्टर की साख पर भी बट्टा लगा रहा है।

सवालों के घेरे में 'साहब' की चुप्पी,क्या मूकदर्शक बना रहेगा जिला प्रशासन?

सरकारी जमीन पर सरेआम चल रहे इस बुल्डोजर-चैलेंज ने निचले स्तर के कर्मचारियों से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक की कार्यप्रणाली और नीयत पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। जब एक अदने से पटवारी के कारण तहसीलदार के आदेश की धज्जियां उड़ रही हों, तो आम जनता का न्याय प्रणाली और राजस्व विभाग से भरोसा उठना लाजिमी है। इस पूरे महाघोटाले और प्रशासनिक विफलता पर जब जयसिंहनगर तहसीलदार श्रीमती सुषमा धुर्वे से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो हमेशा की तरह उनसे संपर्क नहीं हो सका। अधिकारियों का यह फोन न उठाना और 'रहस्यमयी चुप्पी' साधना ही साबित करता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

अब आर-पार की लड़ाई,क्या रासुका के तहत जेल जाएंगे अतिक्रमणकारी? 

जयसिंहनगर में निर्मित यह 'अंधेर नगरी-चौपट राजा' वाली स्थिति अब बर्दाश्त के बाहर हो चुकी है। क्या जिला प्रशासन के आला अधिकारी इस खुली चुनौती को स्वीकार कर भू-माफियाओं पर रासुका (NSA) और मप्र लोक परिसर (बेदखली) अधिनियम के तहत जेल भेजने की कठोर कार्रवाई करेंगे? या फिर यूं ही फाइलों में कागजी नोटिसों का खेल चलता रहेगा और सरकारी जमीन भू-माफियाओं की जागीर बन जाएगी? जनता अब कमिश्नर और कलेक्टर की तरफ देख रही है कि क्या वे अपने इन लापरवाह मातहतों (एसडीएम, तहसीलदार और पटवारी) पर नकेल कसते हैं या माफियाराज के आगे घुटने टेक देते हैं।

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