महंगाई की मार से बेहाल दुग्ध उत्पादकों ने खोला मोर्चा; कहा-कौड़ियों के दाम दूध खरीदकर चांदी काट रही हैं कंपनियां, हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं
Junaid Khan - शहडोल। क्षेत्र के रीढ़ माने जाने वाले पशुपालक और किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में आ चुके हैं। बदहाल व्यवस्था और शासन-प्रशासन की चौतरफा बेरुखी से आक्रोशित सैकड़ों दुग्ध उत्पादक किसानों ने मंगलवार को बुढ़ार चौक स्थित ऐतिहासिक गणेश मंदिर से कलेक्ट्रेट कार्यालय तक गगनभेदी नारों के साथ एक विशाल आक्रोश रैली निकाली। सड़कों पर उतरे इस जनसैलाब ने न केवल अपनी जायज मांगों को लेकर हुंकार भरी, बल्कि सीधे तौर पर जिला प्रशासन और नीति-नियंताओं की कार्यप्रणाली को खुली चुनौती दे डाली। कलेक्ट्रेट पहुंचकर आक्रोशित किसानों ने कलेक्टर डॉ. केदार सिंह के नाम एक तीखा शिकायती ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर तत्काल सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन उग्र रूप अख्तियार करेगा, जिसकी समस्त जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
लागत दोगुनी, मुनाफा शून्य, कौड़ियों के भाव बिक रहा दूध, चारे के बढ़े दामों ने तोड़ी कमर
पशुपालकों ने प्रशासनिक तंत्र को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आज के इस भीषण महंगाई के दौर में जब हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं, तब दूध की कीमतें वर्तमान में महज 40 से 50 रुपए प्रति किलोग्राम के निचले स्तर पर टिकी हुई हैं। इस कौड़ियों के दाम पर दूध बेचकर किसानों के लिए अपने घर-परिवार का गुजारा करना तो दूर, बेजुबान गाय और भैंसों के लिए दो वक्त के सूखे चारे और दाने का इंतजाम करना भी दूभर हो गया है। दुग्ध उत्पादकों ने साफ शब्दों में मांग रखी है कि गाय के दूध की न्यूनतम कीमत 60 रुपए और भैंस के दूध की कीमत कम से कम 70 रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित की जाए। इसके साथ ही, दूध की गुणवत्ता (फैट) के आधार पर तय होने वाले मूल्य को भी 0.25 से संशोधित कर तत्काल 0.27 किया जाए। किसानों का आरोप है कि बाजार में मिलावटखोर और बिचौलिए सक्रिय हैं, जो उनका हक मार रहे हैं, जबकि हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले असली उत्पादक को भुखमरी के कगार पर धकेल दिया गया है।
खोया उद्योग पर भी संकट के बादल, बड़े आंदोलन की सुगबुगाहट
इस आक्रोशित प्रदर्शन में केवल दूध ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े सह-उत्पादों की अनदेखी का मुद्दा भी गरमाया रहा। प्रदर्शनकारियों ने दूध के साथ-साथ खोया (मावा) की कीमतों में भी सम्मानजनक और आनुपातिक बढ़ोतरी करने की पुरजोर मांग की है। किसानों का कहना है कि जब तक प्रशासन इन बुनियादी मांगों को पूरा करने के लिए कोई ठोस और लिखित ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक उनका यह संघर्ष थमने वाला नहीं है। कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद वरिष्ठ किसान नेताओं ने नीतिगत विफलता पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को खोखला करने वाली इस प्रशासनिक सुस्ती को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि समय रहते कीमतों को संशोधित नहीं किया गया, तो जिले भर के पशुपालक चक्काजाम और दुग्ध आपूर्ति ठप करने जैसे कड़े कदम उठाने को मजबूर होंगे।
