वर्दी को 'रील्स' और 'कमाई' का जरिया बनाने वाले आरक्षक पर चला एसपी का डंडा, निलंबित

अवैध 'लाखों-करोड़ों' की सोशल मीडिया कमाई पर उठे सवाल, क्या तिवारी जी के बैंक खातों और परमिशन के दावों की होगी उच्च स्तरीय जांच? 


Junaid Khan - शहडोल। शहडोल पुलिस महकमे में उस वक्त हड़कंप मच गया जब पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव ने अनुशासनहीनता और वर्दी की गरिमा को तार-तार करने वाले यातायात आरक्षक विवेकानंद तिवारी पर निलंबन की गाज गिरा दी। आरक्षक पर आरोप है कि वे पिछले 15 दिनों से बिना किसी सूचना के अपनी शासकीय ड्यूटी से नदारद (गैरहाजिर) थे। इस दौरान वे पुलिस रेगुलेशन 64 के सेवा नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए विभिन्न स्थानों पर पुलिसिया रौब और वर्दी का इस्तेमाल कर इंस्टाग्राम व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए वीडियो (रील्स) बना रहे थे। एसपी की इस त्वरित और सख्त कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि महकमे में 'रक्षक' को 'रील्स स्टार' बनने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती।

वर्दी से 'मोनो' गायब,रसूख और प्रचार की भूख

उल्लेखनीय है कि सस्पेंड किए गए आरक्षक विवेकानंद तिवारी शासकीय दायित्वों को ठेंगा दिखाकर निजी लाभ, व्यक्तिगत प्रचार और सोशल मीडिया पर व्यूज बटोरने की अंधी दौड़ में शामिल थे। चौंकाने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियोज में आरक्षक पुलिस की निर्धारित वर्दी से 'मोनो' (विभागीय प्रतीक चिन्ह) हटाकर, लेकिन शेष वर्दी धारण कर सक्रिय दिखाई दे रहे थे। यह सीधे तौर पर मध्य प्रदेश पुलिस की छवि को धूमिल करने और वर्दी का व्यावसायिक दुरुपयोग करने का गंभीर मामला है, जिसे पुलिस कप्तान ने सेवा शर्तों का उल्लंघन मानते हुए बर्दाश्त नहीं किया।

पत्रकारों ने पहले ही खोला था मोर्चा, तब रसूखदारों ने डाला था पर्दा 

यदि शहडोल के जमीनी पत्रकारिता के अनुभवों की बात करें, तो यह कोई पहला मामला नहीं है। विगत कुछ महीनों और सालों से स्थानीय सजग पत्रकारों ने लगातार यह मुद्दा उठाया था कि लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स और व्यूज वाले ये 'रील्स वाले साहब' नियम-कायदों को ताक पर रखकर काम कर रहे हैं। लेकिन उस समय जब मीडिया ने इस पर सवाल दागे, तो आरक्षक के कुछ 'खास' उच्च अधिकारियों, दोस्तों और चाहने वालों ने पत्रकारों से मनुहार और मिन्नतें शुरू कर दी थीं। उन्होंने यह तर्क देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की थी कि "तिवारी जी तो अच्छा काम कर रहे हैं, मोटिवेशनल वीडियो बनाते हैं, इससे कोई कमाई नहीं होती।"

दिमाग तिवारी जी का,खाता किसी और का? बेनामी कमाई का बड़ा खेल 

पत्रकारिता के खोजी कैमरों और इनपुट्स से यह बात भी छनकर सामने आ रही है कि सोशल मीडिया से होने वाली इस 'मलाई' को छिपाने के लिए भारी दिमाग लगाया गया। सूत्र बताते हैं कि वीडियो में चेहरा, वर्दी और रूतबा तो तिवारी जी का होता था, लेकिन जब बात डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से होने वाली लाखों-करोड़ों रुपये की मोटी कमाई (रेवेन्यू) की आती थी, तो बैंक खाते और ट्रांजैक्शन किसी दूसरे के नाम पर सेट किए गए थे। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि अगर वीडियो साहब बना रहे हैं, तो इसके पीछे चल रहे इस 'बेनामी बिजनेस' और अघोषित संपत्ति का असली हिस्सेदार कौन है?

सामने से गुजरते रहे शराबी और नशेड़ी, आरक्षक काटते रहे सिर्फ 'वीडियो '

जिस पद और कर्तव्य के लिए सरकार इन कर्मचारियों को जनता के टैक्स के पैसे से तनख्वाह देती है, आरक्षक का ध्यान उस ट्रैफिक व्यवस्था पर कभी था ही नहीं। उनके सामने सड़कों पर सरेआम तीन-सवारियां (ट्रिपल राइडिंग) फर्राटे भरती रहीं, नशेड़ी और रईसजादे तेज रफ्तार में गाड़ियां दौड़ाते रहे, हादसे होते रहे, लेकिन 'रील्स स्टार' आरक्षक का पूरा ध्यान चालान काटने या जुर्माना लगाने के बजाय कैमरे के एंगल और वाहवाही लूटने पर था। नियम विरुद्ध चल रहे वाहन चालकों पर कानूनी कार्रवाई करने के बजाय, वे सिर्फ वीडियो की स्क्रिप्ट के हिसाब से 'दिखावे की समझाइश' देकर व्यूज बटोरने का धंधा चमका रहे थे।

कर्ज और फर्ज भूला, 15 दिन की छुट्टी लेकर चमकाई 'निजी दुकान' 

हद तो तब हो गई जब ड्यूटी के प्रति जरा सा भी फर्ज और कर्ज न समझने वाले आरक्षक ने बिना परमिशन 15 दिनों का मैदान छोड़ दिया और पूरी तरह से वीडियो बनाने की 'अवैध दुकान' में व्यस्त हो गए। इन्हें न तो सरकार के कायदे कानून दिखे, न ही पुलिस मुख्यालय की सोशल मीडिया गाइडलाइंस। जब कोई पुलिस कर्मचारी वर्दी में रहकर सरकार की गाइडलाइंस का मजाक उड़ाने लगे और उसे अपनी नौकरी से ज्यादा फिक्र सोशल मीडिया के डॉलर्स की होने लगे, तो यह व्यवस्था के लिए एक खुली चुनौती बन जाती है।

चौथी जागीर को चुनौती: सवाल पूछने वाले पत्रकारों को किया 'ब्लॉक' 

इस पूरे मामले में आरक्षक का अहंकार भी सिर चढ़कर बोल रहा था। जब भी जिले के कुछ निष्पक्ष पत्रकारों ने इनकी इस कार्यप्रणाली पर खबरें चलाना चाहा या उनसे तीखे सवाल पूछने की कोशिश की, तो साहब ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का सम्मान करने के बजाय तानाशाही रवैया अपनाया। आरक्षक तिवारी ने सवाल उठाने वाले पत्रकारों के फोन नंबर, वॉट्सऐप और सोशल मीडिया हैंडल को ब्लॉक लिस्ट में डाल दिया। यह इस बात का प्रमाण था कि 'घड़ा पूरी तरह भर चुका था' और वे सच का सामना करने से कतरा रहे थे।

क्या तथाकथित 'ऊपर की परमिशन' देती है वीआईपी गुंडागर्दी की छूट?

आरक्षक अक्सर विभागीय हलकों और लोगों के बीच यह दावा करते घूमते थे कि "हम ऊपर से विशेष परमिशन लेकर यह सब चला रहे हैं।" अब प्रशासन और सरकार से जनता का यह तीखा सवाल है कि क्या पुलिस विभाग की कोई परमिशन किसी आरक्षक को यह छूट देती है कि वह अपने सामने बिना हेलमेट घूमते लोगों, शराबियों और स्टंटबाजों पर केस दर्ज न करे? क्या परमिशन इसलिए दी जाती है कि सरकारी ड्यूटी की तिलांजलि देकर सिर्फ अपने निजी बैंक खातों को भरा जाए?

जनता की मांग: सिर्फ निलंबन नहीं, बर्खास्तगी और परिवार के खातों की हो जांच 

एसपी रामजी श्रीवास्तव द्वारा की गई यह निलंबन की कार्रवाई बिल्कुल न्यायसंगत और सराहनीय है, लेकिन यह इस गंभीर बीमारी का सिर्फ एक सतही इलाज है। शहडोल की जनता और सजग मीडिया यह मांग करता है कि ऐसे लापरवाह और वर्दी का सौदा करने वाले कर्मचारियों को तत्काल नौकरी से बर्खास्त किया जाना चाहिए। साथ ही, आरक्षक और उनके पूरे परिवार के बैंक खातों की उच्च स्तरीय जांच (Inquiry) होनी चाहिए कि सोशल मीडिया के जरिए इस 'वर्दी के खेल' में अब तक कितनी अवैध संपत्ति अर्जित की गई है।

प्रशासन के लिए कड़ा सबक: रील्स के चक्कर में न रूठे जनता का विश्वास 

इस लीड खबर का असर और संदेश बिल्कुल साफ है—यह पुलिस प्रशासन की साख को बचाने की एक बड़ी लड़ाई है। अगर आज एक आरक्षक को सोशल मीडिया के रसूख के आगे घुटने टेकने दिए गए, तो कल को पूरा महकमा कानून व्यवस्था संभालने के बजाय कैमरे के सामने खड़ा नजर आएगा। एसपी की इस कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि कानून सबके लिए बराबर है। अब देखना यह है कि क्या आने वाले दिनों में इस बेनामी कमाई के साम्राज्य की परतें खुलती हैं या रसूखदार एक बार फिर अपने चहेते को बचाने के लिए पर्दे के पीछे से गोटियां सेट करते हैं।

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