अंधी-बहरी व्यवस्था,02 माह से अंधेरे में बरूका का बैगान टोला, 'साहबों' के कानों तक नहीं पहुँच रही ग्रामीणों की चीख

शिकायतों के बाद भी बिजली विभाग बेखबर,सोहागपुर ब्लॉक में गहराया बिजली संकट, अब भाजपा नेता ने भी संभाला मोर्चा


Junaid Khan - शहडोल। संभाग मुख्यालय की नाक के नीचे बसे सोहागपुर ब्लॉक के ग्राम बरूका स्थित बैगान टोला में पिछले दो महीनों से पसरा अंधेरा विद्युत मंडल की घोर लापरवाही और प्रशासनिक नाकामी की जीती-जागती तस्वीर पेश कर रहा है। यहाँ का ट्रांसफार्मर पिछले 60 दिनों से पूरी तरह जलकर खाक पड़ा है, लेकिन विद्युत विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं। दो महीने के लंबे अंतराल के बावजूद न तो ट्रांसफार्मर बदला गया और न ही ग्रामीणों की सुध ली गई। विद्युत आपूर्ति ठप होने से जहाँ एक ओर उमस भरी गर्मी में बैगा समुदाय के ग्रामीण, मासूम बच्चे और बुजुर्ग बेहाल हैं, वहीं दूसरी ओर पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी दर-दर भटकने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि ग्रामीणों ने विभाग के चक्कर काटकर, शिकायती आवेदन देकर और आला अधिकारियों की चौखट पर माथा टेककर गुहार लगाई, लेकिन निरंकुश हो चुके अधिकारियों के सिर पर जूं तक नहीं रेंगी। जनसमस्याओं के प्रति विभाग का यह असंवेदनशील और अड़ियल रवैया साफ बयां करता है कि संभाग मुख्यालय से सटे इलाकों में जब यह आलम है, तो दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों की स्थिति क्या होगी! विभाग की इस आपराधिक खामोशी और चरमराती व्यवस्था पर आक्रोश जताते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता कैलाश तिवारी ने भी अब विद्युत मंडल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने विभाग के आला हुक्मरानों को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट शब्दों में अपेक्षा की है कि बिना किसी और देरी के तत्काल नया ट्रांसफार्मर स्थापित कर विद्युत आपूर्ति बहाल की जाए। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि समय रहते व्यवस्था न सुधरी तो विभाग की इस हठधर्मिता का खामियाजा आम जनता के भारी जनआक्रोश के रूप में भुगतना पड़ेगा। सवाल यह उठता है कि क्या बिजली बिल का समय पर तकादा करने वाला विद्युत विभाग जनता को निर्बाध बिजली देने के अपने मूलभूत कर्तव्य को भूल चुका है? क्या अधिकारियों को केवल कागजी आंकड़ों में ही अपनी पीठ थपथपाना आता है? अब देखना यह होगा कि इस जनमुद्दे के उठने के बाद सोहागपुर का विद्युत अमला अपनी नींद से जागता है या फिर बैगान टोला के निर्दोष ग्रामीणों को यूँ ही अंधेरे की सजा भुगतने के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।

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