चौकीदारों की नींद या मिलीभगत? कबाड़ियों को शहडोल पुलिस का 'अभयदान'आखिर कब जागेगा प्रशासन?
Junaid Khan - शहडोल। संभाग मुख्यालय शहडोल में कानून और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। जिले के नवलपुर स्थित पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय के अति-सुरक्षित परिसर में बने विद्युत उपकेंद्र से बेखौफ चोरों ने 1600 केवीए क्षमता वाले भारी-भरकम ट्रांसफॉर्मर पर हाथ साफ कर दिया। चोरों ने बड़ी ही तसल्ली से ट्रांसफॉर्मर को तोड़कर उसके भीतर से लाखों रुपये मूल्य के तांबे के तार, कीमती कलपुर्जे और हजारों लीटर तेल चोरी कर लिया और मौके पर सिर्फ लोहे का क्षतिग्रस्त ढांचा छोड़ गए। चोरी गए सामान की कीमत लगभग 16 लाख रुपये आंकी गई है। विश्वविद्यालय परिसर की बाउंड्री वॉल लांघकर घुसे चोरों ने इस बड़ी वारदात को अंजाम दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि परिसर की सुरक्षा के लिए दर्जनों सुरक्षाकर्मी, चौकीदार और चपरासी तैनात हैं, लेकिन फिर भी तीन दिनों की छुट्टी का फायदा उठाकर चोर इतने बड़े ट्रांसफॉर्मर का तांबा काटकर ले गए और किसी को भनक तक नहीं लगी। विश्वविद्यालय के कुलसचिव आशीष तिवारी और सहायक प्राध्यापक डॉ. बृजेंद्र कुमार पांडेय की शिकायत पर पुलिस ने खानापूर्ति करते हुए अज्ञात चोरों के खिलाफ अपराध दर्ज तो कर लिया है, लेकिन सवाल उठता है कि जहां सुरक्षा गार्ड 24 घंटे तैनात रहते हैं, वहां इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया? क्या यह विश्वविद्यालय के चपरासियों और चौकीदारों की घोर लापरवाही है या फिर भीतर की ही कोई बड़ी मिलीभगत?
खाकी की खामोशी पर सवाल,अवैध कबाड़ियों को किसकी शह?
शहडोल शहर में आए दिन हो रही पाइप, केबल, ट्रांसफॉर्मर और लोहे की चोरियों की जड़ में अवैध कबाड़ी फल-फूल रहे हैं। शहर के कोने-कोने में अवैध रूप से चल रहे कबाड़खानों में चोरी का सामान धड़ल्ले से खपाया जा रहा है। नवागत पुलिस अधीक्षक डाॅ. संजय कुमार अग्रवाल के कमान संभालने के पहले से लेकर अब तक लगातार समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में कबाड़ियों के इस अवैध नेटवर्क की खबरें प्रमुखता से आ रही हैं। इतना ही नहीं, शहर के जागरूक नागरिक और जनप्रतिनिधि कई बार पुलिस अधिकारियों से सीधे मिलकर शिकायत कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद शहडोल पुलिस कबाड़ियों पर कोई ठोस और सख्त कार्रवाई करने से कतरा रही है। शहर में खुलेआम हो रही चोरियों और कबाड़ के अवैध कारोबार पर पुलिस का यह ढुलमुल रवैया उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। जानकारों का कहना है कि यदि पुलिस प्रशासन ईमानदारी से कबाड़खानों पर छापेमारी और सख्त जांच करे, तो 100% चोरी का सारा सामान बरामद हो सकता है। परंतु ऐसा न होना यह साफ दर्शाता है कि कहीं न कहीं कबाड़ियों और अवैध कारोबारियों की 'सेटिंग' से निचले स्तर पर हफ्ता वसूली का खेल चल रहा है।
विद्युत विभाग व पुलिस की नाकामी, कब जागेगी सरकार?
विश्वविद्यालय परिसर में दो बड़े ट्रांसफॉर्मर लगे थे, जिसमें से एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में बंद पड़ा था। चोरों को यह सटीक जानकारी होना कि किस ट्रांसफॉर्मर में करंट नहीं दौड़ रहा है, विद्युत विभाग के भीतर की लापरवाही या मुखबिरी की ओर भी इशारा करता है। शहर में चाहे बिजली के लंबे-लंबे तार गायब हो रहे हों या भारी मशीनरी और पाइप, पुलिस प्रशासन का तंत्र पूरी तरह से सुस्त और लकवाग्रस्त नजर आ रहा है। जनता में आक्रोश व्याप्त है कि आखिर पुलिस प्रशासन आम जनमानस और शासकीय संपत्तियों की सुरक्षा करने के बजाय क्या केवल मूकदर्शक बनी रहेगी? अगर पुलिस इसी तरह अवैध कबाड़ियों और अपराधियों को संरक्षण देती रही और अपने आंख-कान बंद रखेगी, तो शहर से अपराधियों के हौसले कभी पस्त नहीं होंगे। अब देखना यह है कि इस 16 लाख के बड़े ट्रांसफॉर्मर कांड के बाद जिम्मेदार पुलिस अफसर नींद से जागते हैं और कबाड़ियों के खिलाफ कोई बड़ा हंटर चलाते हैं, या फिर हर बार की तरह मामला फाइलों और सीसीटीवी फुटेज की जांच के नाम पर ठंडा बस्ता में दबा दिया जाएगा!
