सड़क खोदकर जनता को नरक में झोंका,06 महीने से फाइल दबाकर बैठे अफसर

चहेते ठेकेदार को काम न मिलने के चक्कर में टेंडर अटकाया, कलेक्ट्रेट की फटकार भी बेअसर 


Junaid Khan - शहडोल। नगर पालिका की हठधर्मिता, कथित सांठगांठ और प्रशासनिक अंधेरगर्दी का खमियाजा एक बार फिर शहडोल की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। विकास के नाम पर विनाश की इबारत लिखते हुए नगर पालिका प्रशासन ने बस स्टैंड से बुढ़ार चौक तक 1300 मीटर लंबी मॉडल सड़क निर्माण के लिए लोगों के आशियाने और दुकानें तो उजाड़ दिए, सड़क को गड्ढों में तब्दील कर दिया, लेकिन नाली निर्माण का टेंडर बीते 06 महीनों से ठंडे बस्ते में दबा रखा है। आलम यह है कि सड़क की खोदाई के बाद बुढ़ार चौक से बस स्टैंड के बीच जगह-जगह लबालब पानी भर चुका है, जिससे राहगीरों और स्थानीय व्यापारियों का जीना मुहाल हो गया है। परिषद द्वारा स्वीकृत टेंडर एस्टीमेट के अनुसार 18 मीटर मॉडल सड़क की जगह 17 मीटर चौड़ाई में निर्माण का निर्णय लिया गया था, जिसमें 1 करोड़ 43 लाख रुपए की लागत से नाली निर्माण का टेंडर जारी किया गया था। लेकिन टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद महीनों से फाइलों को रोके रखना नगर पालिका के भ्रष्ट तंत्र और मनमानी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सूत्रों से छनकर आ रही खबरें बेहद चौंकाने वाली हैं। बताया जा रहा है कि इस पूरी टेंडर प्रक्रिया को रोकने के पीछे नगर पालिका में सक्रिय एक 'खास गिरोह' की शह है। जब अधिकारियों के मनपसंद और चहेते ठेकेदारों को टेंडर मिलता नहीं दिखा और किसी बाहरी ठेकेदार ने सरकारी दरों से कम (बिलो) में टेंडर डाल दिया, तो अफसरों के पेट में दर्द शुरू हो गया। अब अंदरखाने साजिश रची जा रही है कि किसी भी तरह से इस टेंडर को निरस्त कर अपने 'आकाओं' के पक्ष में नया खेल खेला जाए। नगर पालिका की इस कारस्तानी से परेशान ठेकेदारों ने अब इस पूरे फर्जीवाड़े और देरी की जांच के लिए सीधे संभागायुक्त (कमिशनर) की चौखट पर दस्तक देने की तैयारी कर ली है। ताज्जुब की बात यह है कि जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी कलेक्टर डॉ. केदार सिंह ने खुद मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए नगर पालिका सीएमओ निशांत ठाकुर को दूरभाष पर जमकर फटकार लगाई और तत्काल मलबा हटाने के कड़े निर्देश दिए थे। इसके बावजूद 'बेखौफ' और 'लापरवाह' नगर पालिका प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और शुक्रवार को भी मौके से मलबा हटाने का काम शुरू नहीं हो सका। शीर्ष अधिकारियों के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाता यह रवैया साफ दर्शाता है कि नगर पालिका में जनहित नहीं, बल्कि निजी स्वार्थ और कमीशनखोरी का खेल हावी है।

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