एसईसीएल में 'महाभारत साख दांव पर,क्या भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी 'कठपुतली' कमेटियों के आगे घुटने टेकेगा प्रबंधन?

चोर दरवाजे से इंट्री की कोशिशें तेज, केंद्रीय महामंत्री के वित्तीय घपलों की जांच के बीच HMS ने खोला मोर्चा 


Junaid Khan - शहडोल। बिलासपुर गेवरा-दीपका। देश के सबसे बड़े और मुनाफे वाले कोयला अंचल एसईसीएल (SECL) के गेवरा और दीपका क्षेत्रों में श्रमिक राजनीति का पारा अब सामान्य से बहुत ऊपर निकल चुका है। हालात यह हैं कि यूनियनों की वैधानिकता और प्रशासनिक साख को लेकर प्रबंधन और यूनियनों के बीच सीधे 'आर-पार' की जंग छिड़ गई है। हिंद खदान मजदूर फेडरेशन (HMS) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रेशम लाल यादव द्वारा मोर्चा खोले जाने के बाद, एसईसीएल के गलियारों में हड़कंप मच गया है। फेडरेशन ने सीधे तौर पर गेवरा क्षेत्र के महाप्रबंधक और बिलासपुर मुख्यालय को कठघरे में खड़ा करते हुए तीखा शिकायती पत्र सौंपा है। इसमें साफ चेतावनी दी गई है कि यदि 31 दिसंबर 2025 से पूर्व विधिवत और लोकतांत्रिक तरीके से गठित समितियों को दरकिनार कर, हाल ही में 'चोर दरवाजे' से बनाई गई विवादित कमेटियों को तवज्जो दी गई, तो कोयला खदानों में कभी भी औद्योगिक शांति का जनाजा उठ सकता है। इस सीधे अल्टीमेटम ने एसईसीएल के प्रशासनिक ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों की रातों की नींद उड़ा दी है। जांच के घेरे में 'आका': वित्तीय और असंवैधानिक गड़बड़ियों के दाग, फिर भी अपनों को उपकृत करने का खेल। इस पूरे 'महायुद्ध' की जड़ें श्रमिक संगठन के शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान और गंभीर वित्तीय सदाचार के हनन से जुड़ी हैं। हिंद खदान मजदूर फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रेशम लाल यादव ने कोयला मजदूर सभा के केंद्रीय महामंत्री नाथूलाल पाण्डेय के खिलाफ सीधा और बेहद गंभीर हमला बोला है। आरोप है कि केंद्रीय महामंत्री स्वयं ट्रेड यूनियन कोल फेडरेशन और पंजीयक (रजिस्ट्रार) व्यावसायिक संघ, रायपुर के समक्ष गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, आर्थिक घपलों और संविधान विरोधी कृत्यों के आरोपों में जांच का सामना कर रहे हैं। HMS का तीखा और तार्किक सवाल यह है कि जब खुद नेतृत्वकर्ता की वैधानिकता और ईमानदारी पर जांच की तलवार लटक रही है, तो उनके द्वारा आनन-फानन में बैकडोर से गठित की गई नई कमेटियों को कैसे वैध माना जा सकता है? यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र को गुमराह कर अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का एक असंवैधानिक पैंतरा है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। प्रबंधन को 'तीन टूक' चेतावनी: 'फर्जी' चेहरों से की बात, तो ठप हो जाएगा कोयलांचल। फेडरेशन ने इस पूरे मामले में एसईसीएल प्रबंधन की चुप्पी और कुछ अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि यह तथाकथित विवादित समितियां खुद को असली नुमाइंदा बताकर न केवल लगातार पत्राचार कर रही हैं, बल्कि आधिकारिक बैठकों में घुसपैठ करने की फिराक में हैं। HMS ने प्रबंधन के सामने तीन टूक मांगें रखते हुए साफ कर दिया है कि:

पहला: 31 दिसंबर 2025 से पहले की मूल और मान्यता प्राप्त समितियों को ही आधिकारिक वार्ता के लिए टेबल पर बैठाया जाए। दूसरा: जिन नई कमेटियों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज हैं, उनकी जांच पूरी होने तक उनके साथ होने वाले हर तरह के पत्राचार और संवाद पर तत्काल प्रभाव से 'कड़ा प्रतिबंध' लगाया जाए। तीसरा: बिलासपुर मुख्यालय द्वारा इस संबंध में गेवरा-दीपका सहित सभी क्षेत्रीय कार्यालयों को बिना किसी देरी के कड़े और स्पष्ट गाइडलाइन जारी किए जाएं। इस पत्र की प्रतिलिपि रायपुर रजिस्ट्रार से लेकर बिलासपुर के शीर्ष हुक्मरानों को भेजी जा चुकी है। अब गेंद एसईसीएल प्रबंधन के पाले में है। या तो वह नियमों की दुहाई देकर इन विवादित कमेटियों को ब्लैकलिस्ट करे, या फिर कोयलांचल में एक बड़े औद्योगिक टकराव और तालाबंदी की नई इबारत लिखने के लिए तैयार रहे। प्रशासनिक शह या लापरवाही? देश को ऊर्जा देने वाले कोयलांचल में यदि श्रमिक संगठनों के भीतर इस कदर अविश्वास और असंवैधानिक गतिविधियां पनप रही हैं, तो प्रबंधन की खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या प्रबंधन जानबूझकर जांच के घेरे में आए चेहरों को शह दे रहा है, या फिर किसी बड़े दबाव में आकर खदानों की सुरक्षा और औद्योगिक शांति को दांव पर लगा रहा है? बिलासपुर मुख्यालय को यह समझना होगा कि यह मामला सिर्फ दो गुटों की लड़ाई नहीं, बल्कि एसईसीएल के प्रशासनिक अनुशासन और पारदर्शिता की साख का है।

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