शहडोल में 'खाकी-खादी और खनिज' के गठजोड़ पर वन विभाग का बड़ा प्रहार

डीएफओ की इंट्री से रेत माफियाओं की 'सेटिंग' ध्वस्त, घिरे खनिज विभाग ने साख बचाने के लिए परोसे 4 माह पुराने आंकड़े 

कानून को ठेंगा,नरवार-बिझौरी में छापेमारी करने पहुंची डीएफओ की गाड़ी पर पथराव, पुलिस ने रफा-दफा करने की कोशिश की; जब वन अमला जान पर खेलकर लड़ रहा, तब बंद कमरों में बैठकर 'जुगाड़' और 'कागजी कार्रवाई' में व्यस्त रहा खनिज महकमा 


Junaid Khan - शहडोल। संभाग की जीवनदायिनी नदियों का सीना चीरकर प्राकृतिक स्वरूप को मटियामेट करने वाले रेत और कोयला माफियाओं के हौसले इस कदर बुलंद हो चुके हैं कि अब उन्हें न तो कानून का खौफ है और न ही वर्दी का। जिले में चल रहे इस अवैध कारोबार की रीढ़ पर उस समय करारा प्रहार हुआ, जब दक्षिण वनमंडल की डीएफओ श्रद्धा पेंद्रे ने महज 14 किलोमीटर दूर नरवार-बिझौरी में आधी रात को अचानक दलबल के साथ खुद कमान संभालते हुए छापामार कार्रवाई की। डीएफओ और डिप्टी रेंजर की गाड़ियों को अचानक सामने देख दो विभागों (खनिज और स्थानीय पुलिस) के साथ अभयदान की 'जुगाड़ सेटिंग' पाकर बेखौफ चल रहे माफिया तंत्र में हड़कंप मच गया। बौखलाए माफियाओं ने न केवल कानून को चुनौती दी, बल्कि डिप्टी रेंजर की गाड़ी पर पथराव कर हमला किया और बीट गार्ड की बाइक को धक्का मारकर गिरा दिया। शर्मनाक पहलू यह है कि जहां वन विभाग अपनी जान जोखिम में डालकर इन माफियाओं से लोहा ले रहा है, वहीं स्थानीय पुलिस इस जानलेवा हमले को एक 'सामान्य घटना' बताकर ठंडे बस्ते में डालने और माफियाओं को परोक्ष संरक्षण देने का घिनौना प्रयास कर चुकी है।

खनिज विभाग की कार्यशैली पर तीखे सवाल और कागजी लीपापोती 

इस पूरी कार्रवाई ने शहडोल खनिज विभाग की लचर और संदेहास्पद कार्यशैली को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। जब चौतरफा बदनामी और अपनी 'सेटिंग' बिगड़ने से हड़कंप मचा, तो अपनी साख बचाने की छटपटाहट में खनिज अधिकारी राहुल शांडिल्य मार्च महीने से लेकर अब तक के चार महीने पुराने आंकड़ों की ढाल लेकर सामने आ गए। विभाग ने दावा किया कि उन्होंने 87 मामलों में 25.89 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है, जिसमें 28 मार्च को नरवार में 30 घनमीटर, 12 मई को 24 घनमीटर, 27 मई को ब्योहारी के मनटोला व भमरहा में 200 घनमीटर, 29 मई को डोंगरीटोला में 4 जगह, 5 जून को बिरोड़ी व पैरीबहरा में 105 घनमीटर और 12 जून को जमोदी व नौढ़िया में 200 घनमीटर रेत नष्ट करने का दावा किया गया है। लेकिन वरिष्ठ और खोजी पत्रकारिता का बुनियादी सवाल यह है कि यदि चार महीनों से इतनी भारी-भरकम कार्रवाई कागजों पर चल रही थी, तो जमीन पर नदियों का सीना रोज क्यों छलनी हो रहा था? साफ है कि यह आंकड़े महज नाकामी को छिपाने और आला अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकने की कागजी बाजीगरी है।

सिर्फ रेत ही नहीं, कोयले के काले खेल में भी संलिप्तता की बू

जिले में केवल रेत ही नहीं, बल्कि काले सोने (कोयले) की भी अवैध माइनिंग का एक समानांतर और संगठित साम्राज्य खड़ा कर दिया गया है। खनिज विभाग के ही आंकड़े तस्दीक कर रहे हैं कि 8 अप्रैल को ग्राम कुम्हारी में जेसीबी की जब्ती, 11 मई को ग्राम लालपुर में एक जेसीबी और ट्रैक्टर की जब्ती, तथा 9 जून को ग्राम केशवाही में चार बड़े गड्ढों को भरवाकर उत्खनन बंद कराने का जो नाटक किया गया, वह सिर्फ दिखावा था। 14 जून को ग्राम बटुरा से 10 टन कोयला और फिर 18 जून को पुलिस, राजस्व व खनिज विभाग की संयुक्त टीम द्वारा उसी ग्राम बटुरा से 80 टन अवैध उत्खनित कोयला जब्त होना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि कार्रवाई के नाम पर केवल 'खानापूर्ति' की जा रही है ताकि मुख्य सरगना सुरक्षित रह सकें। वन विभाग के इस कड़े तेवर ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि नीयत साफ हो तो माफिया घुटनों पर आ सकते हैं, लेकिन शहडोल का खनिज अमला और स्थानीय पुलिस प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण आज खुद जनता और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कटघरे में खड़ी है।

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