कोतवाली पुलिस की जल्दबाजी और संदिग्ध 'क्लीन चिट' पर उठे गंभीर सवाल
अस्पताल में नशेड़ी की इंट्री और बिस्किट खिलाकर बच्चे को गोद में उठाने की वारदात को पुलिस ने बताया 'घरेलू विवाद'; सवाल- क्या किसी रसूखदार नेता, सेठ या अधिकारी के दबाव में केस को रफा-दफा करने का खेला खेल रही पुलिस? कहाँ सो रहे थे निजी अस्पताल के सुरक्षाकर्मी?
Junaid Khan - शहडोल। निजी अस्पताल में हाई-वोल्टेज ड्रामा और पुलिस की संदिग्ध थ्योरी। पाली रोड स्थित निजी श्रीराम अस्पताल उस समय रणक्षेत्र में तब्दील हो गया जब बच्चा चोर की आशंका में एक अजनबी युवक की भीड़ ने जमकर धुनाई कर दी। इमेज वीडियो के अनुसार, बुढ़ार क्षेत्र का निवासी यह अजनबी युवक अस्पताल के संवेदनशील वार्ड में घुसकर एक मासूम बच्चे को बिस्किट खिलाने लगा और देखते ही देखते उसे गोद में उठा लिया। परिजनों और वहां मौजूद जनता की सतर्कता से एक बड़ा अनर्थ होते-होते बचा और आक्रोशित भीड़ ने युवक को दबोचकर पीट दिया। लेकिन असली खेल तो कोतवाली पुलिस की इंट्री के बाद शुरू हुआ। पुलिस वाहन में बैठाने के दौरान भी पिटाई के लाइव वीडियो सामने आने के बावजूद, पुलिस ने महज़ कुछ घंटों की 'कागजी जांच' में ही यह घोषणा कर दी कि मामला सिर्फ 'गलतफहमी' और 'घरेलू विवाद' का था। पुलिसिया स्क्रिप्ट के मुताबिक युवक की पत्नी मायके चली गई थी और उसने तबीयत खराब होने की बात कहकर उसे अस्पताल बुलाया था, जहां वह नशे की हालत में बच्चे से 'लाड' जताने लगा।
क्या पुलिस के इस 'दावे' के पीछे है कोई अदृश्य रसूखदार हाथ?
एक अनुभवी पत्रकार की पैनी नजर से देखें तो पुलिस का यह ढीला-ढाला और घिसा-पिटा तर्क गले नहीं उतरता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस के पास इस बात का क्या पुख्ता प्रमाण या सबूत है कि वह युवक बच्चा चोर गिरोह का हिस्सा नहीं था? पुलिस ने किस आधार पर इतनी बड़ी वारदात को महज़ 'नशे की हालत' और 'गलतफहमी' का नाम देकर आरोपी को तत्काल उसके परिजनों के सुपुर्द कर दिया? शहडोल की गलियारों में यह चर्चा आम है कि इस पूरी लीपापोती के पीछे किसी बड़े स्थानीय नेता, धनपशु सेठ या रसूखदार अधिकारी का भारी दबाव काम कर रहा है, जिसके इशारे पर पुलिस ने गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करने के बजाय मामले को रफा-दफा करने का गेम खेला है। जब तक गहन और निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक पुलिस की इस जल्दबाजी को 'सांठगांठ' और 'लेन-देन' के संदेह से अलग नहीं देखा जा सकता।
निजी अस्पताल की सुरक्षा रामभरोसे, मोटी फीस वसूलने वालों की खुली पोल
इस पूरे घटनाक्रम ने श्रीराम अस्पताल प्रबंधन की सुरक्षा व्यवस्था की भी धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। मरीज के तीमारदारों से मोटी रकम वसूलने वाले इस निजी अस्पताल के सुरक्षा गार्ड (Security Guards) आखिर उस वक्त कहाँ सो रहे थे, जब एक भारी नशे की हालत में धुत अजनबी व्यक्ति आसानी से अस्पताल के भीतर दाखिल हो गया? क्या अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा घेरा सिर्फ दिखावे के लिए हैं? एक नशेड़ी का बिना किसी रोक-टोक के अंदर घुसना और इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देने के करीब पहुंच जाना यह साबित करता है कि अस्पताल प्रबंधन मरीजों और उनके नौनिहालों की सुरक्षा को लेकर कतई गंभीर नहीं है। यदि भीड़ ने मुस्तैदी न दिखाई होती और कोई बड़ी अनहोनी हो जाती, तो क्या अस्पताल प्रशासन और पुलिस इसकी जिम्मेदारी लेते?
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की चुनौती,सच को दबाने नहीं देंगे
पुलिस भले ही मामले की आवश्यक जांच पूरी होने का राग अलाप रही हो, लेकिन जनता की अदालत में खाकी की साख पर गहरा बट्टा लग चुका है। बच्चा चोरी जैसे गंभीर संवेदनशील मामलों को इस तरह हल्के में उड़ाना और संदिग्ध को बिना किसी ठोस न्यायिक प्रक्रिया के छोड़ देना, शहडोल पुलिस की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करता है। एक जिम्मेदार समाचार पत्र होने के नाते हम प्रशासन और आला अधिकारियों को सीधी चुनौती देते हैं कि वे इस मामले की परतें खोलें और जनता के सामने असली सच लेकर आएं। क्या पुलिस किसी अदृश्य दबाव के आगे घुटने टेक चुकी है या फिर इस 'गलतफहमी' के पीछे कोई गहरी और भयानक साजिश छिपी है, जिसका पर्दाफाश होना अभी बाकी है?
