प्रशासनिक नाकामी पर बड़ा हमला,बेरोजगारी,महंगाई और किसानों की बदहाली पर मौन क्यों? संवेदनशील मुद्दों की आड़ में असली समस्याओं को दबाने का आरोप
संवैधानिक अधिकारों की दुहाई,अनुच्छेद 25, 26, 29 और 30 का हवाला देकर पूछा,क्या जनसंवाद के बिना थोपा जा रहा है कानून?
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों को सीधे तौर पर चुनौती देते हुए प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जिला अध्यक्ष मोहम्मद यासीन खान के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर महामहिम राज्यपाल के नाम शहडोल कलेक्टर को एक बेहद तल्ख और तीखा ज्ञापन सौंपा (Ref. No. 26/YK/003, दिनांक 19/06/2026)। इस ज्ञापन के माध्यम से न केवल सरकार की मंशा पर सवाल उठाए गए हैं, बल्कि स्थानीय प्रशासन को भी यह चेतावनी दे दी गई है कि यदि बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश की गई, तो आगामी दिनों में आंदोलन और उग्र रूप अख्तियार करेगा। पार्टी ने साफ शब्दों में देश की विविधता और बहुलतावादी संस्कृति का हवाला देते हुए कहा है कि भारत का संविधान विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं को अक्षुण्ण रखने की आजादी देता है। ऐसे में यूसीसी के नाम पर पूरे देश को एक ही सांचे में ढालने का प्रयास सीधे तौर पर संविधान की मूल भावना और ताने-बाने पर कड़ा प्रहार है।
असली मुद्दों पर मौन, संवेदनशील विषयों पर क्यों है प्रशासन और सरकार की पैनी नजर?
पत्रकारिता के मापदंडों और जनता की आवाज को मुखर करते हुए इस ज्ञापन में सीधे तौर पर प्रशासन और व्यवस्था की दुखती रग पर हाथ रखा गया है। AIMIM ने आरोप लगाया है कि आज पूरा जिला और प्रदेश बेरोजगारी की मार झेल रहा है, महंगाई आसमान छू रही है, अन्नदाता (किसान) बदहाली के आंसू रो रहा है, और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा महिलाओं की सुरक्षा जैसे गंभीर मोर्चों पर प्रशासनिक अमला पूरी तरह विफल साबित हुआ है। युवाओं का भविष्य अधर में लटका है, लेकिन इन बुनियादी जन-समस्याओं के समाधान की बजाय संवेदनशील और ध्रुवीकरण करने वाले यूसीसी जैसे विषयों को जानबूझकर आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि आम जनता अपनी बुनियादी मांगों के लिए आवाज न उठा सके। नेतृत्वकर्ताओं ने कड़े शब्दों में चुनौती देते हुए कहा कि बिना व्यापक जनसंवाद, सर्वसम्मति और सभी हितधारकों (विशेषकर आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों) से परामर्श किए बिना किसी भी प्रकार का कानून लागू करना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है।
संविधान के अनुच्छेदों का हवाला,राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग
ज्ञापन में कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को मजबूती से रखते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 29 और 30 का विशेष उल्लेख किया गया है, जो प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं। जिला इकाई ने राज्यपाल से विनम्रतापूर्वक परंतु बेहद कड़े लहजे में अनुरोध किया है कि वे इस संवेदनशील विषय पर तत्काल संज्ञान लें और राज्य सरकार को इस प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने के निर्देश जारी करें। गंगा-जमुनी तहजीब और देश की सामाजिक न्याय व्यवस्था को बनाए रखने का संकल्प दोहराते हुए चेतावनी दी गई है कि बिना व्यापक सहमति के किसी भी प्रकार की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा। अब देखना यह है कि इस तीखी चुनौती के बाद स्थानीय प्रशासन और सरकार का अगला रुख क्या होता है।
