ठेकेदार और अफसरों की सांठगांठ आई सामने
डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के प्रभार वाले जिले में बदहाल हुई व्यवस्था, 37 नवजातों की जिंदगी अधर में लटकाने वाले अधिकारियों पर कब गिरेगी गाज?
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और शहडोल जिले के प्रभारी मंत्री राजेंद्र शुक्ला के तमाम दावों के बावजूद शासकीय बिरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज में अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार का खेल बदस्तूर जारी है। मेडिकल कॉलेज के अति-संवेदनशील एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) वार्ड में पिछले तीन दिनों से ऑक्सीजन पाइप लाइन में रिसाव होता रहा, लेकिन बेपरवाह प्रबंधन और सुस्त नर्सिंग स्टाफ हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया और स्थिति हाथ से निकलने लगी, तब जाकर हड़कंप मचा। जिस वक्त यह जानलेवा लापरवाही बरती जा रही थी, उस समय वार्ड में करीब 37 नवजात शिशु जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे थे। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा था? मासूम बच्चों की सांसों पर मंडराते इस खतरे ने साफ कर दिया है कि स्वास्थ्य विभाग में मरीजों की जान की कीमत शून्य बनकर रह गई है।
कमीशनखोरी और घटिया निर्माण का खेल,ठेका कंपनी की धांधली पर कब होगी एफआईआर?
मामला सिर्फ देख-रेख की कमी का नहीं, बल्कि निर्माण के दौरान ठेकेदार द्वारा की गई लीपापोती और तकनीकी धांधली का भी है। जानकारों के मुताबिक, ऑक्सीजन पाइप लाइन बिछाने के दौरान ठेका कंपनी ने नियमों को ताक पर रखकर घोर लापरवाही बरती है। हर वार्ड के बीच अनिवार्य रूप से लगने वाले 'चुटकी वॉल्व' (कट-ऑफ वॉल्व) गायब कर दिए गए। नतीजा यह है कि किसी एक जगह खराबी आने पर पूरे ऑक्सीजन नेटवर्क को बंद करना पड़ता है। कमीशनखोरी के चक्कर में अधिकारियों ने ठेकेदार के इस घटिया और जानलेवा काम को आंख बंद करके पास कर दिया। डीन डॉ. गिरीश बी. रामटेके भले ही इसे "वॉसर की छोटी सी समस्या" बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन सवाल यह है कि यदि ऑक्सीजन सप्लाई में अचानक रुकावट से किसी नवजात की जान चली जाती, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता?
प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल,क्या दोषी अधिकारियों को भेजा जाएगा जेल?
तीन दिनों तक ऑक्सीजन रिसाव को छिपाने और अस्थायी जुगाड़ से काम चलाने वाले जिम्मेदार नर्सिंग स्टाफ, मेंटेनेंस टीम, ठेका कंपनी और मेडिकल कॉलेज के ढुलमुल रवैये पर अब कड़े प्रशासनिक प्रहार की जरूरत है। महज दो घंटे में पाइप लाइन ठीक करा देने का दावा करके अपनी पीठ थपथपाने वाला प्रबंधन अपनी नाकामी छुपाने में लगा है। अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले को ठंडे बस्ते में डालता है या फिर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर भ्रष्ट ठेकेदार का लाइसेंस निरस्त करता है और जिम्मेदार अधिकारियों को निलंबित कर सलाखों के पीछे भेजता है। पूरे ऑक्सीजन नेटवर्क का अविलंब तकनीकी ऑडिट कराकर इस जानलेवा लापरवाही पर कठोरतम कार्रवाई की मांग अब तूल पकड़ चुकी है।
