जनता के हक़ पर डाका,खनन प्रभावितों के पैसों से संवरेगा अफसरों का 'महल'

₹3 करोड़ का DMF फंड कलेक्ट्रेट की मरम्मत में फुंका, प्रशासनिक अनदेखी और भरशाही पर उठे गंभीर सवाल


Junaid Khan - शहडोल। जिले में विकास और खनन प्रभावित आदिवासियों व आम जनता की भलाई के लिए आने वाले डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड (DMF) की बंदरबांट और प्रशासनिक बेलगाम रवैये का एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिस DMF फंड का इस्तेमाल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने के लिए होना चाहिए, उस जनता की गाढ़ी कमाई के 3 करोड़ रुपये से ज्यादा की भारी-भरकम राशि अब चमचमाते कलेक्ट्रेट भवन के जीर्णोद्धार पर फूंकी जा रही है। ताज्जुब की बात यह है कि तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के कारण बीते सालों में कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर और बाहर अचानक छज्जे व छत की छपाई (प्लास्टर) गिरने के दर्जनों मामले हो चुके हैं, जिसमें अपनी फरियाद लेकर आने वाले मासूम ग्रामीण और आमजन कई बार बाल-बाल बचे। जब कलेक्ट्रेट की इमारत भरभराकर गिर रही थी और आम जनता की जान पर बन आई थी, तब लोक निर्माण विभाग (PWD) और जिम्मेदार प्रशासनिक अमला गहरी नींद में सोया रहा। अब अचानक 3 करोड़ रुपये का भारी बजट पास कर जनहित के फंड को अफसरों के आरामगाह और इमारतों की रंग-रोगन में झोंका जा रहा है, जो सीधे तौर पर शासन-प्रशासन की नीयत और कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। कलेक्ट्रेट भवन के जीर्णोद्धार के लिए प्रशासनिक स्वीकृति तो दे दी गई है, लेकिन तकनीकी स्वीकृति के नाम पर फाइलों को PWD विभाग के चीफ इंजीनियर (CE) कार्यालय रीवा भेजा गया है। सवाल यह उठता है कि निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की अनदेखी करने वाले ठेकेदारों और इसे मौन स्वीकृति देने वाले जिम्मेदार इंजीनियरों व अधिकारियों पर अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इतिहास गवाह है कि वर्ष 2016 में तत्कालीन कलेक्टर मुकेश कुमार शुक्ला के कार्यकाल में भी कलेक्टर चेंबर को लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर बेहतर और आकर्षक बनाया गया था। अब महज 10 साल के भीतर दोबारा उसी चेंबर और भवन को 'नया स्वरूप' देने के नाम पर जनता के खून-पसीने की कमाई का तमाशा बनाया जा रहा है। लोक निर्माण विभाग और प्रशासनिक अमले की इस साठगांठ का ही नतीजा है कि 10 साल पहले बनी इमारतें इतनी जर्जर स्थिति में पहुंच जाती हैं कि उनके छज्जे गिरने लगते हैं। क्या 3 करोड़ रुपये के इस नए प्रोजेक्ट में भी सिर्फ अफसरों और ठेकेदारों की जेब भरने का काम होगा या कोई ठोस जवाबदेही तय की जाएगी? जिले की जनता अब सीधे तौर पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों, विभागीय मंत्रियों और शीर्ष प्रशासनिक हुक्मरानों से जवाब मांग रही है। एक तरफ जहां ग्रामीण इलाकों में सड़कों, स्वास्थ्य केंद्रों और स्कूलों की हालत खस्ताहाल है, वहीं दूसरी तरफ खनिज मद की राशि का इस तरह गैर-जरूरी और मनमाने ढंग से सरकारी कार्यालयों के सौंदर्यीकरण में इस्तेमाल किया जाना सरासर अन्याय है। जब कलेक्ट्रेट जैसे अति-महत्वपूर्ण और संवेदनशील स्थान पर घटिया निर्माण के कारण हादसों की आशंका बनी रहती है, तो जिले के अन्य सरकारी निर्माणों की गुणवत्ता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े हादसे के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठा था? क्या इस ₹3 करोड़ के बजट में फिर से वही पुरानी लापरवाही और भ्रष्टाचार का खेल दोहराया जाएगा? अगर जिम्मेदार मंत्रियों और आला अधिकारियों ने इस मामले में तत्काल संज्ञान लेकर DMF फंड के बंदरबांट पर रोक नहीं लगाई और जर्जर निर्माण के जिम्मेदार इंजीनियरों-अफसरों पर सख्त एक्शन नहीं लिया, तो जनता के इस जलते मुद्दे को लेकर जनाक्रोश और उग्र रूप धारण कर सकता है।

Previous Post Next Post