स्वतंत्रता दिवस पर भी पुलिस मीडिया सेल मौन, उमरिया और अनूपपुर की तुलना में पिछड़ा संभाग मुख्यालय
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के जनजातीय बहुल और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शहडोल संभाग मुख्यालय में इन दिनों पुलिस प्रशासन और मीडिया के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान पूरी तरह पटरी से उतर चुका है। जिले के विभिन्न थानों में पदस्थ जिम्मेदार अधिकारी व कर्मचारी सूचनाएं साझा करने में इस कदर टालमटोल कर रहे हैं कि दैनिक घटनाओं, प्राथमिकियों (FIR) और कार्रवाई की प्रामाणिक जानकारी के लिए स्थानीय पत्रकारों को दर-दर भटकना पड़ रहा है। हालत यह है कि किसी मामले की जानकारी या आधिकारिक फोटो-वीडियो मांगने पर थाने के कर्मचारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। इस ढुलमुल रवैये के कारण जहां एक ओर शासन-प्रशासन के पारदर्शी व्यवस्था के दावों की धज्जियां उड़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर आम जनता तक सही और निष्पक्ष समाचार समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।
गौरतलब है कि शहडोल में पुलिस की यह लापरवाही नई नहीं है, लेकिन वर्तमान में इसने गंभीर रूप ले लिया है। आज से लगभग दो-तीन वर्ष पूर्व तत्कालीन पुलिस अधीक्षक कुमार प्रतीक के कार्यकाल में भी पत्रकारों ने इस विषय को प्रमुखता से उठाया था। उस समय तत्कालीन एसपी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए लापरवाह पुलिसकर्मियों को कड़ी फटकार लगाई थी और स्पष्ट निर्देश दिए थे कि जिले भर के थानों से दर्ज मामलों, शिकायतों व एनसीआर की सूचनाएं तत्काल एसपी कार्यालय स्थित मीडिया सेल को भेजी जाएं। वहां से बाकायदा दैनिक आधार पर प्रेस नोट तैयार कर पत्रकारों के अधिकृत व्हाट्सएप ग्रुप और ईमेल पर प्रसारित किए जाते थे। इसके बाद एसपी रामजी श्रीवास्तव के कार्यकाल में भी यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही। परंतु पिछले तीन-चार महीनों से यह पारदर्शी प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि शहडोल संभाग का मुख्यालय है, जहां पुलिस महानिरीक्षक (IG) और पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) जैसे वरिष्ठ अधिकारी बैठते हैं। इसके बावजूद संभाग मुख्यालय की मीडिया व्यवस्था पड़ोसी जिलों अनूपपुर और उमरिया की तुलना में बेहद दयनीय स्थिति में है। अनूपपुर और उमरिया जिलों में पुलिस प्रशासन रोजाना छोटे-बड़े हर मामले की अधिकृत जानकारी, प्रेस नोट और विजुअल मीडिया ग्रुप्स व आधिकारिक पोर्टलों पर समय से उपलब्ध कराता है। वहीं शहडोल में आलम यह है कि हफ्ते में महज दो या तीन दिन ही नाममात्र के प्रेस नोट जारी होते हैं। यदि कोई पत्रकार व्यक्तिगत पहचान के बल पर सूचना जुटा ले तो ठीक, अन्यथा आम पत्रकारों के साथ उपेक्षात्मक रवैया अपनाया जाता है। अकर्मण्यता की पराकाष्ठा इस स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) पर देखने को मिली, जब इतिहास में पहली बार पुलिस मीडिया सेल द्वारा राष्ट्रीय पर्व का भी कोई आधिकारिक प्रेस नोट जारी नहीं किया गया। हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी पर पुलिस अधीक्षक कार्यालय में ध्वजारोहण, उत्कृष्ट कार्य करने वाले पुलिसकर्मियों के सम्मान और प्रमाण पत्र वितरण की पूरी जानकारी मीडिया को भेजी जाती थी। लेकिन इस बार राष्ट्रीय पर्व पर भी चुप्पी साध ली गई। हाल ही में पदस्थ हुए नवागत पुलिस अधीक्षक श्री संजय कुमार जायसवाल से पत्रकारों को काफी अपेक्षाएं हैं। हालांकि यह अव्यवस्था उनके आने से पूर्व से चली आ रही है, लेकिन अब समय आ गया है कि नवागत एसपी और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लें। पत्रकार जगत की मांग है कि जिले के सभी थाना प्रभारियों और कर्मचारियों को सख्त निर्देश दिए जाएं कि वे मुकदमों और प्रशासनिक कार्रवाइयों को दबाने की प्रवृत्ति छोड़ें। पारदर्शी शासन व्यवस्था के तहत हर छोटे-बड़े मामले की जानकारी, प्रेस नोट और विजुअल्स समय पर मीडिया सेल को भेजे जाएं ताकि पत्रकारों को निष्पक्ष खबरें प्रकाशित करने में सुगमता हो। सूचनाएं छिपाने और गोपनीयता का बहाना बनाकर टालमटोल करने वाले लापरवाह कर्मचारियों पर कड़ा प्रशासनिक चाबुक चलाना बेहद जरूरी हो गया है, ताकि संभाग मुख्यालय की साख बहाल हो सके और मीडिया को अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन का समान अवसर मिले।
