06 महीने से मौन साधे बैठा प्रशासन,कानून और नियमों की धज्जियां उड़ाकर एनएच विभाग ने निजी बाउंड्री पर बना दी सड़क; कलेक्टर, तहसीलदार से लेकर थाने तक गुहार बेअसर, क्या यही है सुशासन?
Junaid Khan - शहडोल। स्थानीय कोतवाली थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत गोरतरा में प्रशासन और सड़क निर्माण एजेंसियों की शह पर कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। सरकारी महकमों की इस कदर तानाशाही देखने को मिल रही है कि आम नागरिक के मौलिक और वैधानिक अधिकारों को जेसीबी के पंजों तले रौंद दिया गया। पीड़ित दुर्गा प्रसाद यादव (निवासी शहडोल) की निजी स्वामित्व वाली भूमि पर सुरक्षा के लिए बनाई गई बाउंड्री वॉल को NH (नेशनल हाईवे) विभाग द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना, बिना किसी नोटिस और बिना किसी वैधानिक अधिग्रहण प्रक्रिया के रातों-रात जमींदोज कर दिया गया और उस पर अवैध रूप से सड़क का निर्माण करा दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि जिले में भू-स्वामियों के अधिकार सुरक्षित नहीं हैं और जिम्मेदार अमला कानून का पालन कराने के बजाय खुद ही कानून की धज्जियां उड़ाने पर आमादा है। इस पूरे प्रकरण में प्रशासन, संबंधित विभाग और स्थानीय पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। मामला केवल एक बाउंड्री वॉल तोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर प्रशासनिक असंवेदनशीलता और पुलिसिया निष्क्रियता की पराकाष्ठा है। पीड़ित दुर्गा प्रसाद यादव न्याय की उम्मीद में पिछले छह महीनों से दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। पीड़ित ने 8 जनवरी 2026 को ही तहसीलदार के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत कर न्याय की गुहार लगाई थी, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। इसके बाद पीड़ित ने 30 जून को कलेक्टर कार्यालय में भी लिखित शिकायत दर्ज कराई, परंतु नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही रहा। जब स्थानीय प्रशासन, राजस्व विभाग और पुलिस बल से न्याय की हर उम्मीद टूट गई, तब जाकर हताश पीड़ित को मजबूरन 25 जुलाई को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (CM Helpline) का दरवाजा खटखटाना पड़ा। सवाल यह उठता है कि क्या जिले के आला अधिकारी और पुलिस महकमा केवल कागजी बैठकों और खोखले दावों तक सीमित रह गए हैं? क्या एनएच विभाग और निर्माण एजेंसी को किसी की निजी संपत्ति पर अवैध कब्जा करने की खुली छूट दे दी गई है? शिकायत के छह महीने बाद भी कार्रवाई न होना इस बात का पुख्ता सबूत है कि जिम्मेदार अधिकारी इस घोर लापरवाही और मनमानी में मूकदर्शक बने हुए हैं। जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले अधिकारी आखिर किसके इशारे पर एक आम नागरिक को दर-दर भटकने पर मजबूर कर रहे हैं? यदि समय रहते इस तानाशाही रवैये पर अंकुश नहीं लगाया गया और पीड़ित भू-स्वामी को उसकी संपत्ति का हर्जाना व न्याय नहीं मिला, तो यह मामला केवल प्रशासनिक नाकामी नहीं बल्कि शासन की साख पर एक बड़ा धब्बा साबित होगा। प्रशासन को अब कागजी जवाबदेही से बाहर निकलकर इस सीधे भ्रष्टाचार और मनमानी पर कड़ा रुख अख्तियार करना ही होगा, वरना जनता का व्यवस्था से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा।
