शहडोल में कानून व्यवस्था पस्त,कबाड़ माफिया मस्त,20 लाख के ट्रांसफार्मर कांड में सोहागपुर पुलिस की नींद देर से खुली,उठ रहे गंभीर सवाल
Junaid Khan - शहडोल। जिले की कानून व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की साख पर एक बार फिर गहरा धब्बा लगा है। सोहागपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत पंडित शंभूनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय परिसर से 20 लाख रुपये की कीमत के बिजली ट्रांसफार्मर के कीमती पार्ट्स चोरी होने के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पूरी तरह कटघरे में आ खड़ी हुई है। वारदात को अंजाम दिए एक सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन खाकी के हाथ आज भी पूरी तरह खाली हैं। घटना के इतने दिनों बाद सोहागपुर पुलिस की नींद तब टूटी जब कबाड़ियों के ठिकानों पर खानापूर्ति के नाम पर दबिश दी गई। छापेमारी में न तो कोई माल बरामद हुआ और न ही चोरों का सुराग लगा। सवाल यह उठता है कि जब वारदात के तुरंत बाद कबाड़ कारोबारियों और संदिग्ध ठिकानों की निगरानी की जानी चाहिए थी, तब पुलिस हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी रही? अब इस विलंब का पूरा फायदा उठाकर कबाड़ माफिया ने चोरी की संपत्ति को ठिकाने लगा दिया है।
सालों से न जांच, न कार्रवाई,बड़े कबाड़ियों और सफेदपोशों के गठजोड़ से फल-फूल रहा अवैध नेटवर्क
जिले में कबाड़ कारोबारियों पर कार्रवाई के नाम पर पुलिस महकमा वर्षों से केवल आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहा है। हकीकत यह है कि आज तक किसी भी बड़े कबाड़ी के मुख्य व्यवसायिक परिसर, गोदाम या संदिग्ध ठिकानों की निष्पक्ष जांच नहीं की गई। छोटे-मोटे फुटपाथी कबाड़ियों को पकड़कर कागजी खानापूर्ति करना और उन पर मामूली धाराएं लगाकर मामला रफा-दफा कर देना पुलिस की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है। हद तो यह है कि कई बड़े कबाड़ माफिया, जिन पर दर्जनों गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं और जो जिलाबदर तक रह चुके हैं, वे खुलेआम कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। सिस्टम की मेहरबानी का आलम यह है कि ऐसे चिन्हित अपराधियों के पासपोर्ट तक बन जाते हैं और वे बेखौफ होकर विदेश यात्राओं के मजे ले रहे हैं। बिना ऊपर से नीचे तक की मजबूत सेटिंग और संरक्षण के इतना बड़ा अवैध तंत्र संचालित होना कतई संभव नहीं है।
सरकारी संपत्तियों पर डाका,विश्वविद्यालय से लेकर रिलायंस, रेलवे और एसईसीएल तक निशाने पर
शहडोल संभाग में संगठित चोरों और कबाड़ माफिया का दुस्साहस इतना बढ़ चुका है कि वे अब केवल आम घरों या दुकानों तक सीमित नहीं हैं। शंभूनाथ विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था का परिसर हो, एसईसीएल की कोयला खदानें हों, रिलायंस का उपक्रम हो, रेलवे की राष्ट्रीय संपत्ति हो या फिर विद्युत विभाग के कीमती उपकरण—हर जगह बेखौफ होकर लाखों रुपये का माल काटा और चुराया जा रहा है। कबाड़ियों ने बाकायदा चोरों की गिरोहों को सेट कर रखा है, जो हर इलाके से लोहा, तांबा और सरकारी मशीनरी काटकर उनके गोदामों तक पहुंचाते हैं। आए दिन मीडिया में खबरें प्रकाशित होने और सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल होने के बावजूद जिम्मेदार महकमा अपनी आंखें मूंदे बैठा है। क्या पुलिस प्रशासन खुद इन कबाड़ियों के सामने नतमस्तक है या फिर इस पूरे खेल में हिस्सेदारी इतनी बड़ी है कि कार्रवाई का विचार ही ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है?
सोशल मीडिया टैग और ट्वीट् x फेसबुक भी बेअसर,आईजी, डीआईजी और एसपी की चौखट पर दम तोड़ती शिकायतें
शहडोल संभाग का मुख्यालय होने के नाते यहां आईजी, डीआईजी और एसपी जैसे भारतीय पुलिस सेवा के शीर्ष अधिकारी बैठते हैं। स्थानीय नागरिक, जनप्रतिनिधि और पत्रकार आए दिन क्षेत्र में जारी इस खुली लूट की तस्वीरें, वीडियो और खबरें सोशल मीडिया पर अपलोड कर मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों को टैग करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि डिजिटल युग में त्वरित संज्ञान लेने का दावा करने वाला शासन-प्रशासन पूरी तरह मूकदर्शक बना हुआ है। जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और प्रशासनिक ढिलाई से ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदार अधिकारियों को जनता के आक्रोश या सरकारी संपत्ति के नुकसान से कोई सरोकार नहीं रह गया है। खबरें चलने पर कुछ घंटों के लिए तो थोड़ी हलचल दिखाई देती है, लेकिन मामला ठंडा पड़ते ही पूरी व्यवस्था फिर से कबाड़ माफिया की जेब में समा जाती है।
प्रशासनिक नाकामी पर बड़े सवाल,कब तय होगी अधिकारियों की जवाबदेही और कब टूटेगा माफिया का सिंडिकेट?
20 लाख के ट्रांसफार्मर पार्ट्स चोरी मामले ने शहडोल पुलिस के सामने एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती खड़ी कर दी है। क्या सोहागपुर पुलिस और संबंधित जांच टीमें केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहेंगी या फिर इस अंतरप्रांतीय कबाड़ सिंडिकेट की जड़ों तक पहुंचकर मुख्य आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजेंगी? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन थाना प्रभारियों और अधिकारियों की सरपरस्ती में यह अवैध कबाड़ तंत्र सालों से फल-फूल रहा है, उन पर प्रशासनिक कार्रवाई कब होगी? अगर समय रहते बड़े कबाड़ियों के आय के स्रोतों, उनके गोदामों और संदिग्ध गाड़ियों की निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो शहडोल जिले में सरकारी व निजी संपत्तियों पर डाका इसी तरह पड़ता रहेगा। जनता अब महज आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है; उसे परिणाम और जवाबदेही चाहिए।
