अदालत के सख्त रुख के बावजूद कई घंटों इंतजार करवाते रहे जिम्मेदार अफसर, 24 सितंबर की तय तारीख पर नहीं पहुंचे अमले के लोग; अब 26 सितंबर को होगी कागजी खानापूर्ति और नई तारीख का निर्धारण
Junaid Khan - शहडोल। शहर के ऐतिहासिक और प्रमुख महात्मा गांधी स्टेडियम की जमीन के स्वामित्व व कब्जे को लेकर चला आ रहा दशकों पुराना विवाद अब प्रशासनिक हठधर्मिता और न्यायिक अवमानना के बेहद गंभीर मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है। न्यायालय द्वारा 24 सितंबर 2026 को मौके पर पहुंचकर पीड़ित पक्ष (मो. खालिक खान) को विधिवत कब्जा दिलाने के स्पष्ट और कड़े आदेश जारी किए गए थे। अदालत के निर्देशानुसार फरियादी और न्यायालयीय अमला पूरी तैयारी के साथ तय समय पर स्टेडियम स्थल पर पहुंच भी गया, लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से कोई भी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी मौके पर फटकने तक की जहमत नहीं उठाई। पीड़ित पक्ष और अदालती कर्मचारी घंटों तक अधिकारियों की राह ताकते रहे, परंतु प्रशासनिक अमले की गैर-मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि स्थानीय अफसरों के दिलो-दिमाग से अदालत के आदेशों और कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है। घंटों के इंतजार के बाद आखिरकार बैरंग लौटना पड़ा और अब इस पूरी लापरवाही का लेखा-जोखा व लिखा-पढ़ी के बाद 26 सितंबर को आगामी पेशी की तारीख मुकर्रर की गई है, जिसमें कब्जे की अगली प्रक्रिया और कार्रवाई तय होगी। यह पूरा मामला वर्ष 1986 से चला आ रहा है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, सरकार ने 15 अप्रैल 1986 को गांधी स्टेडियम के लिए जमीन का अधिग्रहण किया था और इनायत खान को 53,520 रुपये का मुआवजा दिया था। इसके बाद शासन की ओर से कहा गया कि पूरी जमीन की जरूरत नहीं है तथा 13,680 रुपये वापस जमा करने को कहा गया। इनायत खान द्वारा यह राशि नियमानुसार वापस जमा किए जाने के बावजूद जब जमीन उनके सुपुर्द नहीं की गई, तो विवाद ने कानूनी रूप ले लिया। बाद में इनायत खान के नातियो मो. खालिक खान, मो. वाहिद और मो. अजीम ने जमीन पर अपना दावा जताया और सीमांकन व वास्तविक रकबे की स्थिति स्पष्ट करते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने भी 14 फरवरी 2017 के अपने फैसले में मुआवजा व प्रक्रिया संबंधी आदेश को बरकरार रखते हुए दो माह में भुगतान के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (SLP) भी दायर की, लेकिन शीर्ष अदालत ने उसे भी खारिज कर दिया। कानूनी रूप से चारों तरफ से मात खाने के बाद भी प्रशासनिक मशीनरी का रवैया सरकार और उसके तंत्र की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हाल ही में न्यायालय ने 15 सितंबर को जारी अपने आदेश में संबंधित राजस्व व प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि मो. खालिक खान को संबंधित संपत्ति का कब्जा नियमानुसार दिलाया जाए और यदि कोई कब्जा खाली करने में बाधा डाले या इनकार करे, तो उसे बलपूर्वक हटाकर प्रक्रिया पूरी की जाए। इसके बावजूद 24 सितंबर को निर्धारित कब्जे की तारीख पर प्रशासनिक अधिकारियों का न पहुंचना सीधी-सीधी अदालत की तौहीन और फरियादी के अधिकारों पर डाका डालने जैसा है। शहर के बीचों-बीच स्थित इस सार्वजानिक मैदान में राष्ट्रीय पर्वों के जिला स्तरीय आयोजन होते हैं और नगर पालिका विकास कार्यों का दावा करती है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र खुद को कानून से ऊपर समझने लगा है? जिस तरह से जिम्मेदार अफसरों ने अदालती आदेश को रद्दी का टुकड़ा समझकर किनारे कर दिया, उससे आम जनता का न्याय प्रणाली और शासन की निष्पक्षता से विश्वास उठना लाजमी है। शासन और प्रशासन के इस उपेक्षापूर्ण रवैये से साफ जाहिर होता है कि संबंधित विभागीय अधिकारी अपनी नाकामी और वर्षों पुरानी गलतियों को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं के फैसलों की भी अनदेखी कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि 26 सितंबर को होने वाली न्यायालयीन पेशी में अदालत इन गैर-जिम्मेदार और निरंकुश अफसरों के खिलाफ क्या सख्त रुख अपनाती है। क्या न्यायालय के अवमानना की गाज इन अधिकारियों पर गिरेगी, या फिर पीड़ित को न्याय पाने के लिए सरकारी तंत्र की चौखट पर ऐसे ही चक्कर काटने पड़ेंगे? पूरे मामले में जिस प्रकार से प्रशासनिक हीला-हवाली सामने आई है, उसने सरकार की साख पर भी गहरा धब्बा लगा दिया है।

