10 किमी दूर पीठ पर लादकर बेटे को स्कूल पहुंचा रही लाचार मां, नेता-मंत्रियों के झूठे वादों और अफसरशाही के नियमों के फेर में फंसी दिव्यांग की मदद
Junaid Khan - शहडोल। एक तरफ सरकार सामाजिक कल्याण, दिव्यांग सशक्तिकरण और समावेशी शिक्षा के ढिंढोरे पीटते नहीं थकती, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। जिले के झींक बिजुरी गांव (दरशिला निवासी) से सामने आई यह तस्वीर न केवल प्रशासनिक सुस्ती को उजागर करती है, बल्कि क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, विधायकों, सांसदों और मंत्रियों के दावों पर भी करारा तमाचा है। 12वीं कक्षा में पढ़ने वाला शारीरिक रूप से असमर्थ छात्र राजकुमार जायसवाल अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए रोज संघर्ष कर रहा है। उसकी मां फूल कुमारी अपने बेटे के उज्ज्वल भविष्य के लिए उसे रोजाना 10 किलोमीटर अपनी पीठ पर लादकर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय झींक बिजुरी ले जाती हैं और वापस लाती हैं। आने-जाने में प्रतिदिन 20 किलोमीटर का यह दर्दनाक सफर तय करना पड़ता है। बस के प्रतिदिन के लगभग 50 रुपये के खर्च और गंभीर आर्थिक तंगी के बावजूद, इस बेबस मां ने हार नहीं मानी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जनता के वोटों से चुनकर एयरकंडीशंड गाड़ियों में घूमने वाले नेताओं और आलीशान दफ्तरों में बैठने वाले प्रशासनिक अफसरों को क्या इस मां का दर्द नजर नहीं आता?
अड़ंगों में उलझा मदद का आवेदन,मंत्री से लेकर कलेक्टर दफ्तर तक चक्कर काटने को मजबूर
आश्चर्य और शर्म की बात यह है कि मदद के लिए पीड़ित परिवार ने क्षेत्र के मंत्री दिलीप जायसवाल तक गुहार लगाई और कलेक्टर कार्यालय में भी आवेदन सौंपा, लेकिन दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी एक इलेक्ट्रिक साइकिल तक मयस्सर नहीं हो सकी। प्रशासनिक अधिकारी संवेदनहीनता की हद पार करते हुए केवल नियमों का हवाला देकर पल्ला झाड़ रहे हैं। बुढ़ार में अधिकारियों से बात करने पर तर्क दिया जाता है कि लड़का 18 वर्ष का नहीं है, इसलिए उसे स्कूटी या साधन नहीं दिया जा सकता। क्या नियम-कायदे किसी जरूरतमंद को बुनियादी मदद पहुंचाने से रोकने के लिए बनाए गए हैं या उनकी सहायता के लिए? दूसरी ओर, सामाजिक न्याय विभाग की जिला अधिकारी प्रज्ञा मरावी का रटा-रटाया बयान है कि "यदि आवश्यक दस्तावेजों के साथ शिविर में पहुंचते हैं तो परीक्षण के बाद पात्रता अनुसार योजना का लाभ दिया जाएगा।" यह कार्यशैली साफ दर्शाती है कि जिम्मेदार अधिकारी कागजी औपचारिकताओं में मामला उलझाकर अपनी जवाबदेही से भाग रहे हैं।
मजदूरी छूटी, परिवार चलाना मुश्किल,जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की चुप्पी पर उठते गंभीर सवाल
बेटे को स्कूल ले जाने और पूरे समय वहां रुकने के कारण मां फूल कुमारी को मजदूरी करने का समय भी नहीं मिल पा रहा है, जिससे घर चलाना और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना दूभर हो गया है। जिस मां को 'जननी' और 'जन्नत' का दर्जा दिया जाता है, उसके इस अथक समर्पण और संघर्ष के सामने प्रशासन की नाकामी अत्यंत शर्मनाक है। जब क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, मंत्री, विधायक और सांसद चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करते हैं, तो ऐसे वक्त में वे कहां गायब हो जाते हैं? इस मामले में सीधे तौर पर जिला प्रशासन, सामाजिक न्याय विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधि जिम्मेदार हैं, जिनकी अनदेखी के कारण एक लाचार मां को अपने बेटे के भविष्य के लिए इस कदर प्रताड़ित होना पड़ रहा है। यदि तत्काल इस परिवार को सहायता और साधन उपलब्ध नहीं कराए गए, तो यह सुशासन के दावों पर एक कभी न मिटने वाला दाग रहेगा।
