टीआई के 'स्वैच्छिक' लाइन हाजिर होने के पीछे राजनीतिक दबाव और कथित कलमकारों की सांठगांठ की सुगबुगाहट,क्षेत्र में छिड़ी जोरदार बहस
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले अंतर्गत बुढ़ार थाना प्रभारी (निरीक्षक) संजय जायसवाल के अचानक लाइन हाजिर होने के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। कहने को तो पुलिस अधीक्षक डॉ. संजय कुमार अग्रवाल के आधिकारिक बयान के अनुसार टीआई जायसवाल ने खुद ही अपनी इच्छा से लाइन हाजिर होने का अनुरोध किया था, जिसके बाद उन्हें लाइन अटैच कर दिया गया और थाने की कमान फिलहाल उप-निरीक्षक (एसआई) को सौंपी गई है। लेकिन 20 अगस्त को यातायात थाने से स्थानांतरित होकर बुढ़ार पहुंचे एक कर्तव्यनिष्ठ और सख्त मिजाज अफसर का महज एक माह के भीतर इस तरह पद छोड़ना आम बात नहीं लग रही है। सूत्रों की मानें तो पर्दे के पीछे नेताओं की शह पर पनप रहे अवैध कारोबार, जुए के फड़ों का विवाद और कुछ स्वघोषित कलमकारों (पत्रकारों) का अनुचित हस्तक्षेप इस पूरे घटनाक्रम की असल वजह है।
नेताओं का दबाव और जुए का खेल,खाकी की ईमानदारी पड़ी भारी
विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बुढ़ार और आसपास के क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर नकेल कसने वाले टीआई संजय जायसवाल जब जुए और अवैध फड़ों के विवाद में निष्पक्ष कार्रवाई करने लगे, तो स्थानीय नेताओं की आंख की किरकिरी बन गए। खाकी को अपनी जेब में रखने का मुगालता पालने वाले जनप्रतिनिधियों को यह कतई बर्दाश्त नहीं हुआ कि कोई अधिकारी उनके निर्देशों को ठुकराए। नेताओं के संरक्षण में चल रहे जुए के कारोबार पर जब सख्ती होने लगी, तो तथाकथित धनपुरी और क्षेत्रीय कलमकारों को मोहरा बनाकर अफसर को घेरने का षड्यंत्र रचा गया। धनपुरी के कथित कलमकारों पर कार्रवाई न करने और उल्टे निष्पक्ष अफसर पर दबाव बनाने के इस घिनौने खेल से आहत होकर एक स्वाभिमानी पुलिस अधिकारी ने नेताओं की गुलामी करने के बजाय खुद को लाइन हाजिर करवाना ज्यादा बेहतर समझा।
जिम्मेदार अधिकारियों और शासन-प्रशासन पर उठते गंभीर सवाल
एक तरफ जहां राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन प्रदेश में जीरो टॉलरेंस और सुशासन का दावा करता है, वहीं दूसरी तरफ शहडोल के इस घटनाक्रम ने पूरे प्रशासनिक ढांचे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जनप्रतिनिधियों को जुए और अवैध कारोबार जैसी सामाजिक बुराइयों को संरक्षण देना शोभा नहीं देता; ऐसी राजनीति पर सवाल उठना लाजमी है। जब एक जांबाज और ईमानदार अफसर को राजनीतिक खींचतान और कलम के सिपाहियों के नाम पर जारी अनैतिक दबाव के कारण खुद पद छोड़ना पड़े, तो यह जिला पुलिस प्रशासन और गृह विभाग के लिए अत्यंत सोचनीय विषय है। यदि जिम्मेदार उच्चाधिकारी और शासन-प्रशासन ऐसे मामलों में चुप्पी साधे रहे और अवैध कारनामों को बढ़ावा देने वाले नेताओं पर नकेल नहीं कस पाए, तो जनता का कानून व्यवस्था से विश्वास उठना तय है। अब देखना यह है कि पुलिस कप्तान और शासन-प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर अवैध कारोबारियों व उनके आकाओं पर कार्रवाई करते हैं या फिर ईमानदारी इसी तरह राजनीति की सूली पर चढ़ती रहेगी।
