जिलेभर के विभिन्न थानों से गायब 15 बेटियां और 6 बेटे लापता,एसपी ने 5-5 हजार का इनाम किया घोषित,आखिर कब सुलगती चिंताओं को मिलेगा जवाब?
Junaid Khan - शहडोल। प्रशासनिक दावों और पुलिसिया गश्त के तमाम बड़े-बड़े नारों के बीच शहडोल जिले में कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। किसी घर की लक्ष्मी तो किसी के आंगन की खुशियां बीते कई दिनों से गायब हैं, लेकिन खाकी अब तक इन मासूमों का कोई सुराग नहीं लगा पाई है। जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों से लापता हुए 21 बालक-बालिकाओं की सुरक्षित वापसी पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। हर बीतता दिन परिजनों के सीने में डर और अनहोनी की आशंका को गहरा कर रहा है। मामले की गंभीरता और लगातार उठते जन-सवालों के बीच अब पुलिस अधीक्षक डॉ. संजय अग्रवाल ने पुलिस रेग्यूलेशन के पैरा क्रमांक 80 बी (1) के तहत बड़ी पहल करते हुए प्रत्येक लापता बच्चे की दस्तयाबी और अज्ञात आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए उपयोगी सूचना देने वालों को 5-5 हजार रुपये का नकद पुरस्कार देने की उद्घोषणा की है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस पुलिस अमले के पास हाई-टेक सर्विलांस और आधुनिक तंत्र मौजूद है, क्या वह अब केवल आम जनता की सूचना और इनाम के भरोसे इन मासूमों की किस्मत का फैसला करेगी? प्रशासनिक आंकड़ों की हकीकत देखें तो लापता 21 नाबालिगों में से 15 बालिकाएं और 6 बालक शामिल हैं, जो जिले में महिला व बाल सुरक्षा के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। इसमें सबसे चिंताजनक और खौफनाक स्थिति ब्यौहारी थाना क्षेत्र की है, जहां से अकेले 6 मासूम बालिकाएं रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हुई हैं। इसके अलावा सोहागपुर से 3, सिंहपुर से 2, जैतपुर से 1 और अमलाई से 1 बालिका की तलाश अब तक फाइलों में दर्ज है। वहीं दूसरी ओर, देवलोंद क्षेत्र से 4 बालक-बालिकाओं की गुमशुदगी दर्ज है, जबकि जयसिंहनगर से 2, सीधी थाना क्षेत्र से 2 और गोहपारू से 1 बालक का अब तक कोई अता-पता नहीं चला है। पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी फरमान के अनुसार, लापता बच्चों के बारे में कोई भी पुख्ता सुराग या जानकारी देने वाले व्यक्ति को प्रति प्रकरण 5-5 हजार रुपये का इनाम दिया जाएगा, जिस पर अंतिम निर्णय एसपी का होगा। हालांकि, सरकार और शासन स्तर पर बाल संरक्षण को लेकर चलाई जा रही योजनाओं और पुलिस की 'ऑपरेशन मुस्कान' जैसी मुहिमों की जमीनी हकीकत इन आंकड़ों के आगे दम तोड़ती नजर आ रही है। मासूमों की गुमशुदगी केवल एक पुलिस केस या कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह उन असहाय परिवारों की चीखों और आंसुओं का हिसाब है जो रोज दरवाजे पर आहट सुनते ही इस आस में दौड़ पड़ते हैं कि शायद उनका जिगर का टुकड़ा वापस आ गया। पुलिस ने जन-सहयोग की अपील करके अपनी जिम्मेदारी का दायरा तो बढ़ा दिया है, लेकिन जिस तरह से एक साथ 21 बच्चे गायब हैं और पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं, उससे सीधे तौर पर स्थानीय खुफिया तंत्र और जिम्मेदार थाना प्रभारियों की सजगता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। क्या सिर्फ इनाम की घोषणा कर देने से जिम्मेदार अधिकारी अपनी नाकामियों पर पर्दा डाल सकते हैं? शासन-प्रशासन के आला हुक्मरानों को यह समझना होगा कि समय रहते सख्त और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कानून-व्यवस्था से आम जनमानस का विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। फिलहाल देखना यह होगा कि खाकी द्वारा इनाम का दांव फेंकने के बाद इन मासूमों तक पहुंचने का रास्ता साफ होता है या फिर पीड़ित परिवारों का इंतजार यूं ही अनिश्चितकाल के लिए खिंचता चला जाएगा।
